Monday, 12 August 2013

मैं वो नहीं - -

जाने क्या चाहता है वो शख़्स मुझसे, अक्सर 
होता है दर मुक़ाबिल, दहलीज़ में खड़ा 
तनहा, लिए हाथों में इक -
आदमक़द आईना !
फिर मैं तलाश 
करता हूँ 
उसे दिखाने को इक नया चेहरा, इस रोज़मर्रा 
की तकरार ने मुझे बना रखा है, इक 
ख़ूबसूरत मोहरा, हर क़दम पे 
मैं दे जाता हूँ ज़िन्दगी 
को यूँ फ़रेब, 
असल 
में किसी ने भी मुझे आज तक नहीं देखा - -
बेनक़ाब ! मैं हूँ इक रूह ए इंसान 
मामूली, भीड़ में दबा हुआ 
नुक्कड़ में कुचला 
हुआ, सीलन 
भरी -
दीवारों से रिसता हुआ, तंग गलियों में तनहा 
खांसता हुआ, फुटपाथ के ऊपर चाक 
से उभरे, गुमनाम तस्वीरों में 
अपना वजूद तलाश 
करता, चंद 
सिक्कों 
में कहीं अपनी ज़िन्दगी खोजता हुआ, उसे - - 
कैसे समझाऊं मैं वो नहीं, जिससे 
उसे मुहोब्बत है - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by Partha Bhattacharya