Saturday, 3 August 2013

शब ए तिलिस्म - -

कोई आहट जो सुनसान राहों से गुज़र कर, -
ख़्वाबों की सीड़ियों से हो कर, दिल 
के दर पे दे जाए इक प्यार 
भरा दस्तक ! उस 
अनजान -
ख़ुशबू की चाहत में ज़िन्दगी, बहोत तनहा -
बहोत मुख़्तसर, बेजान सी नज़र 
आई, फूल खिले और झर 
भी गए, आख़री पहर,
लेकिन वो न आए,
भीगी रात 
बहोत परेशां सी नज़र आई, इक ख़ामोशी -
भटकती रही मंज़िल मंज़िल, इक 
धुंआ सा उठता रहा, वादी 
वादी, अपनी ही -
परछाई 
आज मुझे, बहोत अनजान सी नज़र आई - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

midnight street