Saturday, 20 July 2013

भूला न सके - -

राज़ ए वाबस्तगी वो कभी छुपा न सके,

भीड़ उनको यूँ घेरी रही हमेशा उम्र भर -
तन्हा दिल मगर किसी को दिखा न सके,

गुल खिले बहोत हस्ब मामूल हर तरफ़,
अहसास ए गुलदान दोबारा सजा न सके, 

हर मोड़ पे थे, कई नुक़ता ए मरासिम !
किसी से भी दोबारा, दिल मिला न सके, 

वो आज भी मुस्कुराते हैं बा चश्म मर्तूब 
चाह कर भी, तबाह गुलशन बसा न सके, 

ज़माना हुआ, रस्म रिहाई अब याद नहीं 
सुनते हैं, वो आज भी हमें भूला न सके !

राज़ ए वाबस्तगी वो कभी छुपा न सके,
* * 
- शांतनु सान्याल