Thursday, 18 July 2013

अंदरूनी शख्सियत - -

रुसवा है ज़माना तो रहे हमसे, इश्क़ में 
कामिल कायनात है नज़र के -
सामने, अब बढ़ चले 
क़दम कहकशां 
से आगे 
कहीं !
हर रंग ओ नूर हैं फ़िके उस बेमिशाल -
असर के सामने, वो मौजूद दर 
रूह गहराई, वो शामिल 
अंदरूनी शख्सियत,
बहोत मुश्किल 
है उसका 
अलहदा होना, हर एक संग ए साहिल 
है नाज़ुक शीशा, उस बेलगाम 
लहर के सामने - -
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art dale-jackson