Saturday, 6 July 2013

कुछ ख़ास नहीं - -

कुछ ख़ास नहीं फिर भी दिल चाहता कुछ 
ख़ास कहना, न जाने कहाँ हैं बहारों 
की मंज़िल, मिले न मिले -
कोई ग़म नहीं, इक 
नदी है सिमटी 
सी तेरी 
आँखों में कहीं, मेरा वजूद है इक पत्ता - 
शाख़ से टूटा हुआ, तेरी पलकों 
के किनारे किनारे, चाहे 
यूँ ही दूर तक -
बहना !
कुछ ख़्वाब जो थे बहोत नाज़ुक, ग़र टूट 
गए तामीर से पहले, बुरा कुछ -
भी नहीं, कांच की अपनी 
है मज़बूरी, चाहत 
की छुअन 
थी बेसब्र बहोत, सजाने के पहले अगर -
गुलदान कोई हाथों से फिसल 
जाए तो क्या कीजिये !
फिर कभी, किसी 
भीगी रात 
में, गुल शबाना अपने दिल में सजाए - - 
रखना - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by David Adickes 1