Saturday, 29 June 2013

मामुल मुताबिक़ - -

वो कुरेदते हैं बुझी राख कुछ इस तरह 
कि इक गुमां सा रहता है फिर 
सुलगने का, न खेल यूँ 
बार बार, मेरे 
ख़ामोश 
दर्द ए उल्फ़त से, कहीं झुलस कर न -
रह जाए तेरी ख़्वाब की दुनिया, 
रहने दे मुझे यूँ ही अँधेरे 
में मुब्तला,कि इक 
खौफ़ सा 
रहता हर वक़्त दिल को, कहीं फिर न 
जल उठे बुझते चिराग़ ज़िन्दगी 
के, फिर ज़माने में कहीं 
न उठे तबाह कुन 
तूफ़ान !
कि मैं तंग हो चुका हूँ यूँ बारहा जीने -
मरने से, रहने दे मुझे मेरे हाल 
पे मामुल मुताबिक़ !
कुछ वक़्त 
चाहिए 
दर्द को दवा तक तब्दील होने में - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल