Wednesday, 26 June 2013

ख़ुद की तलाश - -

फिर मुझे ख़ुद की तलाश है, खो सा गया हूँ मैं 
मुद्दतों से जाने कहाँ, वो कहते हैं कि -
मेरी मंज़िल सिर्फ़ तेरे पास 
है, इक जुस्तजू जो 
गहराए 
शाम ढले, यूँ लगे लाफ़ानी कोई ख़ुशबू, रूह 
ए इश्क़ के बहोत आसपास है, न 
देख मुझे फिर उन्ही क़ातिल 
निगाह से, कि यूँ बारहा 
जां से गुज़रना 
नहीं -
आसान है, झुकी नज़र पे रहने दे कुछ देर - - 
और अक्स ए कहकशां, कि ज़िन्दगी 
आज मेरी ज़रा उदास है - -
* * 
- शांतनु सान्याल