Tuesday, 14 May 2013

अनश्वर समर्पण - -

इक तटबंध है मेरा वजूद, तू इक नदी अबाध्य 
बेक़ाबू ! वो प्रणय जो तुझे बाँध ले गहन 
अंतर्मन, जीवन चाहे वो उपासना 
अंतहीन, वो पावन चाहत 
जो ले जाए जीवन 
परम सत्य 
की ओर, पाए देह व प्राण परिपूर्ण सार्थकता - -
इक अहसास जो महके अन्दर - बाहर 
छद्म विहीन, कर जाए आत्म -
विभोर  हर  सिम्त 
हर ओर !
वो समर्पण जो हो अनश्वर ज्वलंत अग्नि के 
भी ऊपर !
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by ALBERT BIERSTADT