Monday, 8 April 2013

शीशा ए कायनात - -

मय्यसर कहाँ, वो मंज़िल जहाँ ज़िन्दगी को 
दो पल राहत मिले, उठते हैं हर सिम्त 
मौज कोहराम, हर जानिब है 
इक ग़ैर यक़ीनी सूरत -
हाल, न तुझे 
खोज 
पाए चश्म तिश्ना, न कोई ग़ैर मुन्तज़िर - - 
बारिश का ही इमकां, इक दहन 
मुसलसल है ज़िन्दगी में 
बहरहाल, तेरा 
इश्क जुनूं 
कहीं 
न कर जाए तबाह, दिल का ये नाज़ुक शीशा
ए कायनात - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 


http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by Yvonne Harry