Friday, 5 April 2013

अंतहीन जुस्तजू - -

सब कुछ बिखरा सा रहा दरिया के दोनों 
जानिब, वक़्त था या कोई बहता 
हुआ लहरों का आसमां !
मुख़्तसर दामन 
न समेट 
पाया 
किसी की मुहोब्बत बेशुमार, ज़िन्दगी -
के उस मोड़ पर था मैं बहोत ही 
अकेला, न वो सुन पाए 
मेरी गूंजती सदा, न 
मैं रुक पाया 
उनके 
इंतज़ार में कुछ और ज़रा, जज़्बात रहे 
दूर तक बिखरे हुए, हद ए नज़र !
किसे ख़बर कि वो आज 
भी तलाशते हैं मेरा 
पता, गलियों 
गलियों, 
मंज़िल दर मंज़िल, इक ला मतनाही - 
जुस्तजू - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 

ला मतनाही - अंतहीन 


http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by edvaldas ivanauskas