Wednesday, 24 April 2013

चश्म अन्दाज़ - -

कुछ और मेरे सीने में है, पेश नज़र ज़माना -
कुछ और जुदा, किससे कहें हाल ए 
दिल अपना, दुनिया की 
सियासत अपनी 
जगह, न 
देख 
मुझे यूँ हैरत ए निगाह, मेरी मंज़िल का निशां 
है तेरी आँखों में छुपा, ये परवाज़ सीड़ियाँ 
हैं या कोई मकनूं इम्तहां, हर सांस 
इक नयी आरज़ू, हर क़दम 
ख़्वाबों का कारवां !
इस दौर का 
अपना 
ही 
है क़ानून ज़मीं, जो तोड़ पाए तो हासिल हो 
मानी ज़िन्दगी ! फ़र्क़ गुज़ारी उनका 
अपना नज़रिया, चश्म अन्दाज़ 
मेरा यकसानी - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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