Monday, 15 April 2013

क़ाफ़िले मुहोब्बत के - -


इक इंतज़ार अंतहीन, तरबतर जिस्म 
ओ जां मगर, ज़िन्दगी है या कोई
बियाबां बिखरा दूर तलक !
उस मोड़ पर अक्सर 
खोजता है, ये 
मुस्ताक़ 
ज़मीर, जहाँ वजूद को मिले इक मुश्त 
राहत ए तिश्नगी, ख़्वाबों को मिले 
इक क़तअ हक़ीक़त की 
ज़मीं ! हमसफ़र 
कोई आरज़ी,
या कोई 
गुमशुदा राही, मिल जाए रात ढलने 
से पहले, कि उफ़क़ पे आज 
भी रुके रुके से हैं कुछ 
क़ाफ़िले मुहोब्बत 
के बेक़रार !
* * 
- शांतनु सान्याल 

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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