Wednesday, 10 April 2013

शबनमी अहसास - -

मबहम तीरगी से निकल फिर जिस्म ओ जां 
चाहती है, इक चश्म मुसाफ़िरख़ाना, 
ख़ुदा के वास्ते न करो यूँ बंद 
ज़िन्दगी के रास्ते, कि 
मुद्दतों बाद देखी 
है हमने 
नूर ए आशियाना, कुछ देर सही, रहे रौशन -
चाहतों के बेक़रार जरयां, कुछ पल 
और खुला रहे, ख़्वाबों का 
शामियाना, फिर 
सराब ए 
जज़्बात को मिले शबनमी अहसास, फिर - - 
ज़िन्दगी में खिले गुल नादिर कि 
ज़माना हुआ ख़ुशबू छुपाए 
हम बैठे हैं दिल की 
गहराइयों में !
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

मबहम तीरगी - सघन अँधेरा 
चश्म मुसाफ़िरख़ाना - आँखों का सराय 
जरयां - बहाव 
सराब - मृगजल 
नादिर - दुर्लभ 
painting by STUART