Wednesday, 13 March 2013

सांसों के हरुफ़ - -

न जाने क्या वजह थी, वो शख्स कभी -
खुल कर मिल ही न सका, मैंने 
तो ज़िन्दगी की किताब 
रख दी थी उसके 
सामने -
बेझिझक, बर्हनह सच की तरह, हैरत 
भरी नज़र से उसने देखा ज़रूर,
उलट पलट कर कई बार 
पढने की कोशिश 
भी की शायद, 
लेकिन 
उन्वान से आगे वो बढ़ ही न सका - - 
हाथों से सिर्फ़ सतही अहसास 
किया, दिल की गहराइयों 
को कभी छू न सका, 
कैसे ज़ाहिर 
करूँ 
कि इन ख़ामोश, सांसों के हरुफ़ में
हैं छुपे, बेतरतीब तूफ़ान ठहरे 
हुए, इन धडकनों में हैं 
शामिल कितने 
जज़्बाती 
भंवर 
आपस में उलझे हुए, कि इन रग़ों में 
में बहती है किसी की मुहोब्बत 
तकमील ए हयात के लिए, 
कि  बंजर आँखें 
तकती हों 
जैसे 
उम्र भर की मन्नत लिए सीने में - - 
एक मुश्त बरसात के लिए !
* *
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/



Calm before the Storm