Thursday, 7 February 2013

तेरी इक नज़र - -

अहसास अबरी, साँस मद्धम, कभी तो 
छू जा, तू मेरी मंजमद जज़्बात !
इक ज़माने से, लिए बैठे हैं -
दिल में, टूट कर 
बिखरने 
की ख़्वाहिश, न कर यूँ नज़र अंदाज़ - 
कि बड़ी मुश्किल से कभी -
उभरते हैं, सहरा ए 
आसमां पे 
अब्र घुम्मकड़, रेत में दफ़न ख़्वाबों से 
कभी कभी खिलते हैं गुल -
ख़ारदार, कि तेरी इक 
नज़र में है 
मोजूद,
उम्र भर की दुआओं का असर - - 
* * 
- शांतनु सान्याल  
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
art by Aivazovsky