Tuesday, 30 October 2012

नज़्म

तारुफ़ नहीं आसां, ग़फ़लत ए तक़दीर था 
या कोई शहर फिरंगी, उस पैकर ए 
मसीहा ने मुझे लूटा है सरे 
बज़्म कई बार, वो 
सकूत जो कर 
जाए दिल 
ज़ख़्मी, ऐ रफ़ीक़ ए जां, न देख फिर मुझे 
वही ज़माने की नज़र से, बाअज़
वक़्त पिघला है ये जिस्म 
तब कहीं जा कर 
ज़िन्दगी ने 
पायी है 
जलसा ए रौशनी, जलने दे जिगर मेरा
यूँ ही सुबह होने तलक, मद्धम - - 
मद्धम, बिखरने दे मेरा 
वजूद तेरे इश्क़ में 
बूंद बूंद - - 

- शांतनु सान्याल  
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तारुफ़ - परिचय
 ग़फ़लत - अवहेलना 
शहर फिरंगी - बहुरंगी नलिका 
पैकर - रूप 
बज़्म - महफ़िल
 सकूत - ख़ामोशी 
रफ़ीक़ - दोस्त 
बाअज़ - कई 

نظم
تارف نہیں اسا، غفلت اے تقدیر تھا
یا کوئی شہر پھرگي، اس پےكر اے
مسیحا نے مجھے لوٹا ہے سر
بذم کئی بار، وہ
سكوت جو کر
جائے دل
زخمی، اے رفیق اے جاں، نہ دیکھ پھر مجھے
وہی زمانے کی نظر سے، بعض 
وقت پگھلا ہے یہ جسم
تب کہیں جا کر
زندگی نے
پائی ہے
جلسہ اے روشنی، جلنے دے جگر میرا
یوں ہی صبح ہونے تلک، مدھم -
مدھم، بکھرنے دے میرا
وجود تیرے عشق میں
بوند بوند -

شانتنو سانیال  
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تارف - تعارف
  غفلت - خلاف ورزی
شہر پھرگي - بهرگي ٹیوب
پےكر - طور پر
بذم - محفل
  سكوت - خاموشی
رفیق - دوست
بعض - کئی
 Kaleidoscope Art

Thursday, 25 October 2012

दो लफ्ज़ - -

नज़र के परे भी वो मौजूद, निगाह के 
रूबरू भी ! इक अजीब सा ख़याल
है, या कोई हक़ीक़ी आइना !
ज़िन्दगी हर क़दम 
चाहती है ख़ुद -
अज़्म की 
गवाही, कोई कितना भी चाहे, नहीं 
मुमकिन क़िस्मत से ज़ियादा
हासिल होना, मुस्तक़िल
है मंज़िल, फिर क्यूँ 
परेशां है ये नज़र 
की आवारगी, 

- शांतनु सान्याल 
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 ख़ुद - अज़्म - स्व आकलन 
मुस्तक़िल - स्थायी 
Light-of-Dreams painting by Walfrido Garcia

Friday, 19 October 2012

शाम ढले - -

ग़ैर मुन्तज़िर बारिश की तरह, शाम 
ढले भिगो जाता है कोई दिल 
की दुनिया, महक उठते 
हैं सभी वीरां गोशे
ज़िन्दगी के, 
इक इंतज़ार ए ख़्वाब सा उभरता है -
मखमली अँधेरे में दूर तक,
कोई चुपके से दीया
जला जाता हो -
माबद 
ए क़दीम में जैसे, तेरी झुकी निगाह में 
रुकी रहती हैं मेरी सांसें, हथेली 
में बंद जुगनू की मानिंद, 
बिखरने को बेताब
इश्क़ ए जुनूं
मेरा - -

- शांतनु सान्याल
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ग़ैर मुन्तज़िर - अप्रत्याशित 
वीरां गोशे - वीरान कोने 
माबद ए क़दीम - प्राचीन मंदिर 
इश्क़ ए जुनूं - प्रेम की आसक्ति 
midnight-splendor by Rick Lawrence

Wednesday, 17 October 2012

तीरगी ए हिजाब - -

वो तलाश जो ले जाए ख्याली दुनिया से परे,
हक़ीक़त की ज़मीं हो ज़ाहिर जहाँ, दिल 
चाहता है, फिर तीरगी ए हिजाब 
हटाना, चलों देखे ज़रा फिर 
बेनक़ाब ज़िन्दगी को 
बरअक्स आइना,
ये झिझक 
कैसी जो रोकती है, तन्हाई में भी लिबास -
बदलना, न जाने किस की निगाह है 
खुली रात दिन, न जाने कौन है, 
दर दाख़िल ओ ख़ारिज 
मुसलसल मौजूद, 
चाहता है, हर 
वक़्त, ज़मीर को मुक्कमल बदलना, राह ए 
उजागर की जानिब बढ़ना, ख़ुद को 
पाक इशराक़ से भरना - - 

- शांतनु सान्याल 
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तीरगी ए हिजाब - अंधकार का पर्दा 
दर दाख़िल ओ ख़ारिज - अन्दर और बाहर 
पाक इशराक़ - पवित्र दीप्ती 
Oil Painting by Marina Petro 1

Sunday, 14 October 2012

सबर बेइन्तहा - -

वो सरुर जो तेरी नज़र से छलके, छू जाए
कभी अनजाने यूँही मेरी ज़िन्दगी को, 
हूँ आज भी लिए दिल में सबर 
बेइन्तहा, दे जाए कोई
नूर ए उम्मीद इस 
ग़म अफज़ा 
ज़िन्दगी को, वो रुकी रुकी सी बात, जो -
लब तलक आ के, ख़ामोश बिखर 
जाए अक्सर, कभी तो खुले 
राज़ ए उल्फ़त गुमशुदा,
इक बूंद तो मिले,
प्यासी मेरी 
ज़िन्दगी को - - 

- शांतनु सान्याल
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सरुर - ख़ुशी 
 सबर  बेइन्तहा - अंतहीन धैर्य
artist Pavel Guzenko
Paintings By American Artist Helena Nelson 

Wednesday, 10 October 2012

न जाने क्यूँ - -

बाद ए नसीम बहे मुद्दत गुज़र गए,
कहीं से आए फिर मन्नतों की 
सुबह, फिर खिले ख़ुश्क
फूल, कुछ इस तरह 
से मुड़ गए सभी 
अब्र मर्तूब, 
गोया पहचानते भी न हों बियाबां -
क़दीम, कोई भटके राह ए 
गर्द आलूद, कोई वली
अहद, क्या ख़ूब
है नसीब
ए तक़सीम, उसकी नज़र में जब
हैं सभी यकसां, न जाने क्यूँ 
है फिर फ़र्क ज़माने की 
नज़र में इतना - -

- शांतनु सान्याल 
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बाद ए नसीम - सुबह की हवा 
अब्र मर्तूब - सजल बादल 
क़दीम - प्राचीन 
वली अहद - राजा 

by artes.sn 

Sunday, 7 October 2012

कोई निशानी - -

रख जा कोई तो निशानी दिल पे मनफ़र्द
ख़ुश्बू की तरह, लिखा है जिस्म ओ 
जां पर किसी का नाम हमने,
लाज़वाल सुलगती इक 
आरज़ू की तरह, 
रंग जाए 
जो रूह तलक, दे जा कोई हिना ए इब्दी 
पुरअसर किसी इल्ही क़ाबू की 
तरह, वो तेरी चाहत कम 
तो नहीं, किसी मसफ़ा
ज़िन्दगी से, ले 
चल फिर 
मुझे चाहे जिधर राह ए निजात की - - -
जानिब !

- शांतनु सान्याल 
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मनफ़र्द - निराली 
लाज़वाल - शाश्वत
 इब्दी - अनंत 
इल्ही - दैवी
मसफ़ा - परिशुद्ध
निजात - मुक्ति 
milky way 1

Saturday, 6 October 2012

इक ख़ालीपन - -

दूर तक फैला रहा इक ख़ालीपन, वो क्या 
गए, ख़ला में भटकती रही ज़िन्दगी,
वीरां से हैं कहकशां के किनारे,
चाँद मद्धम सा, बेरौनक
से सितारे, इक 
आग अन -
बुझी 
सी, यूँ सुलगती रही ज़िन्दगी, उतरती है 
रात बदन ख़स्ता, कोह शोलावर 
से, अहसास ज़ख़्मी, कभी 
जलती कभी बुझती 
रही ज़िन्दगी, 
न पूछ 
किस तरह से सांसों ने की हमसे बेवफ़ाई, 
कभी सहरा, कभी संग ख़ारदार 
हर लम्हा उलझती रही 
ज़िन्दगी - - 

- शांतनु सान्याल
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 कोह शोलावर - जलते पहाड़ 
 संग ख़ारदार - नुकीले चट्टान 
art by Le Dernier Homme

Thursday, 4 October 2012

जां से गुज़र जाने की ज़िद !

कोहरा ए फ़जर थी उसकी चाहत, भटकता
रहा उम्र भर, कभी बनके शबनमी बूंदें 
वो टपकता रहा दिल में, नाज़ुक 
बर्ग की मानिंद, जज़्बात 
लरज़ते रहे बारहा, 
कभी ग़ाफ़िल
कभी 
मेहरबां ज़रूरत से ज़ियादा, तखैल से परे 
है उसकी ख़तीर मुहोब्बत, हर क़दम 
इक तूफ़ान ग़ैर मुंतज़िर, हर 
लम्हा नादीद क़यामत,
हर साँस नयी 
ज़िन्दगी !
अमकां हर पल जां से गुज़र जाने की ज़िद !

- शांतनु सान्याल
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फ़जर - भोर
बर्ग - पत्ता 
ग़ाफ़िल - बेपरवाह 
तखैल - कल्पना
ख़तीर - ख़तरनाक 
मुंतज़िर - प्रत्याशित 
अमकां - आशंका
Toni Grote Spiritual Art 

Wednesday, 3 October 2012

जलसा ए नजूम - -

शाम ए चिराग़ जले हैं अभी अभी, न देख यूँ 
डूबती नज़रों से, कहीं मिस्बाह हयात 
बुझ न जाए, सितारों की बज़्म है 
अभी तलक बिखरी बिखरी,
जलसा ए नजूम  में 
कहीं मेरा इश्क़
गुम हो  न 
जाए,
फिज़ाओं में है इक अजीब सा ख़लूस छाया
हुआ, हर सिम्त जैसे उठ चले हों 
धुंध आतफ़ी, न कर रुसवा 
मासूम दिल को इस 
क़दर कि नाबद
हसरत कहीं 
ढह न 
जाए, बड़ी मुश्किल से हैं मिले किश्तियों को 
किनारे, इस बेरुख़ी से कहीं नाज़ुक 
जज़्बात बह न जाए - -  

- शांतनु सान्याल 

मिस्बाह हयात - चिराग़ ज़िन्दगी 
बज़्म - महफ़िल 
जलसा ए नजूम - सितारों का जमाव 
ख़लूस - शुद्धता 
आतफ़ी - जज़्बाती 
नाबद - मंदिर
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celestial beauty 2 

Tuesday, 2 October 2012

उफ़क़ के नज़दीक - -


मुन्नवर किस नूर से है दिल की ज़मीं 
कौन दे गया अचानक, तजदीद 
हयात आज की रात, फिर 
लौट आ रही हैं खोयी 
हुई सदाएं ! न 
जाने 
कौन रख गया दहलीज़ पर गुल -
शबाना, महक चले हैं दिल 
ओ ज़मीर बातरतीब,
फिर ज़िन्दगी में 
है ताज़गी
रवां !
फिर करवटें लेता मेरा रूठा नसीब !  
फिर सुबह उभरने को है 
बेताब, कोई है खड़ा 
उफ़क़ के बहोत 
क़रीब, ले 
हाथों 
में रौशनी बेशुमार, फिर आने को है 
बहार - - 

- शांतनु सान्याल
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मुन्नवर - रौशन 
तजदीद हयात - पुनर्जन्म 
गुल शबाना - रात के फूल 
उफ़क़ - क्षितिज 
feelings 

Monday, 1 October 2012

शख्स बेरुनी - -

रख भी जाओ कोई ख़्वाब, सल्फ़शुदा आँखों 
में इस तरह, कि सुलगते जज़्बात को 
ज़रा आराम मिले, हूँ मैं अपने ही
शहर में शख्स बेरुनी, कोई
खिड़की तो खुले कहीं से,
भटकती रूह को 
पल दो पल 
एहतराम
मिले,
लिए फिरता हूँ सदियों से सीने में लटकाए - 
तस्लीम की आरज़ू, छू लूँ कभी तो 
महकती चांदनी को, कहीं से 
किसी तरह इक दहलीज़
ए गाम तो मिले,
ये चाहत है 
या कोई 
ख़ामोश दहन, रात ढलने से क़बल जिस्म 
ओ जां को मंजिल ए अंजाम मिले !

- शांतनु सान्याल
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 सल्फ़शुदा - थके हुए 
शख्स बेरुनी - विदेशी
एहतराम - इज्ज़त
तस्लीम - पहचान
गाम - क़दम
क़बल - पहले


stranger fog