Thursday, 23 February 2012



हमदर्द  कोई - - - 

हिज़ाब उठते ही हाकिम का चेहरा
जाने क्यूँ सर्द हुआ -

मुस्कराने की सज़ा बयां की थी 
हमने, सिर्फ़ इतनी सी थी बात,
दिल टूटा था हमारा लेकिन -
जाने उसके सीने में क्यूँ दर्द हुआ, 

वो देखते रहे मुझे मजरूह  -
निगाहों से यूँ बार बार , गोया 
सारा शहर पल भर में किसी 
आतिशफिशां के हाथ  सुपुर्द हुआ,

चाह कर भी किसी ने, न 
उठाई बुलंद आवाज़ उसके 
खिलाफ़, कहने को ये तमाम 
दुनिया लेकिन  मेरा हमदर्द हुआ,

- शांतनु सान्याल
 http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
Earth - Bartosz Beda paint exhibition
Journey To The Center Of The Earth, Lagoon Reveal Concept Art.

Saturday, 18 February 2012


ज़रा सी देर 

इस रात की अपनी ही हैं कुछ मजबूरियां 
चांदनी छू तो जातीं हैं जिस्म 
लेकिन छूट से जाते हैं 
कहीं दूर जज़्बात
के दुनिया ! 
उसके बातों में हैं उम्मीद की ख़ुश्बू, मेरे 
दिल में हैं मगर दर्द की अब तलक 
परछाइयाँ, संभलने दे  ज़रा 
न दे दस्तक यूँ बेक़रार
हो कर, अभी 
अभी ज़िन्दगी ने सिखा है लड़खड़ा कर 
चलना, होश आ ले तो ज़रा फिर 
खोल दूँ , मैं सभी बंद 
रोशनदान और 
 खिड़कियाँ - - - 
-- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
  

Wednesday, 15 February 2012


गुमशुदा रहने दे मुझे यूँ ही - - 

हासिल क्या था, क्या नहीं कभी सोचा ही नहीं,
जो मिल गए चलते चलते कहीं, किसी 
मोड़ पे वो कभी, मुस्कराए ज़रूर 
देखा भी इक नज़र और 
बादलों की मानिंद 
बिन रुके 
गुज़र गए, ज़िन्दगी ठहरी रही देर तक उसी 
जगह जहाँ से रूठा था सावन सदियों 
पहले, कि बियाबां के सिवा अब 
यहाँ कुछ भी नहीं, न कोई 
शिकायत, न ही बाक़ी
ख्वाहिशों की
फ़ेहरिस्त, 
बुझ चले हैं चाहत के वो सभी चिराग़, उम्र 
का भी अपना है अलहदा हिसाब, 
न छेड़ शाम ढलते फिर 
वही पुरानी बात, 
मुश्किल से 
ज़िन्दगी को मिली है, इक मुश्त निजात, न 
कर फिर मुतालबा मेरी जां दोबारा, 
कि मुमकिन नहीं बार बार यूँ 
इश्क़े ज़हर पीना, हर 
लम्हा जीना और 
हर लम्हा 
मरना, 
रहने दे मेरा अक्स अजनबी वक़्त के आइने में,
गुमशुदा होना चाहे है दिल फिर तेरे 
शहर में - - - 

-- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
Painting by Matthew Scheuerman 

Wednesday, 8 February 2012


ला उन्वान (untitled )

यूँ  तोहमत लिए हम तेरी बज़्म से उठ आये,
कि अजनबी बादलों का बरसना नहीं लाज़िम,

प्यासी ज़मीं, प्यासे लोग हर सिम्त ख़ामोशी !
है बेदर्द आसमान यहाँ, तड़पना नहीं लाज़िम, 

हर आहट में कोई अपना ही हो ये ज़रूरी नहीं,
ग़ैरों के लिए भी कभी, बिखरना नहीं लाज़िम,

वो सवाल जो ख़ुद इक जवाब हो गहराई लिए,
क्यूँ बेवा सांझ का, फिर संवरना नहीं लाज़िम,

-- शांतनु सान्याल
Evening rain in London painting by David Atkins