Friday, 28 December 2012

नाख़ुदा कोई नहीं - -

उठे फिर कहीं से सघन बादलों के गरदाब, 
ज़िन्दगी चाहती है फिर ऐ तक़दीर 
तुझे आज़माना, न रख 
मुझे अपने दायरे 
में बाँध कर,
चाहता है ज़मीर मेरा, ख़ुद से निकल कर,
तूफ़ान को बहोत क़रीब से पहचानना, 
नाख़ुदा न कोई, न ही साहिल 
मेहरबां, ज़िन्दगी फिर 
भी चाहती है हर 
हाल में 
मंजिल ए मक़सूद तक पहुंचना, ज़माने -
की अपनी हैं शर्ते, अपनी ही 
मजबूरियां, रहने भी 
दे, ऐ आसमां 
रहनुमाई,
दिल की रौशनी है अभी बाक़ी, है अभी 
अधूरा सफ़र तीरगी का, है अभी 
बाक़ी, ऐ हमनफ़स तुझे 
मुक्कमल तौर से 
अपनाना !
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
नाख़ुदा - माझी
गरदाब - भंवर 
alone boat -ART by ROB FRANCO