Thursday, 27 December 2012

सुलगता अहद - -

न बुझा वो अहद सुलगता जो कभी -
हमने उठाई थी यकजा, रहने 
भी दे भरम कुछ तो तेरी 
सदाक़त का, अभी 
तलक है 
मेरे दिल में मौजूद, मुक़द्दस आतिश, 
रहने भी दे ज़रा कुछ देर यूँ ही 
रौशन यक़ीन तहारत 
का, जिस्म की 
है अपनी 
ही मजबूरी, इक दिन तो होगी सुपुर्द 
ए ख़ाक, न कर अलहदा रूह 
ए लामहदूद, रहने भी 
दे उसे ज़िन्दा, 
अपनी 
धडकनों में, कुछ तो मिले नेअमत 
उम्र भर की इबादत का,
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
तहारत - शुद्धता 
नेअमत - आशीष 
सदाक़त - वफ़ादारी 
 अहद -  शपथ 
अलहदा - अलग 
लामहदूद - अंतहीन 
Painting by Lanjee Chee