Monday, 10 December 2012

बेकरां चाहत - -

अभी तलक मेरी आँखों में हैं 
तेरी परछाइयाँ, झुलसते 
सहरा में भी है सुकूं 
ओ राहत मुझे,
नुक़ता 
नज़र के असूल जो भी हो -
जहान के, उजड़ने नहीं 
देती, यूँ तेरी बेकरां
चाहत मुझे,
गिरफ़्त
ए गर्दबार से भी उभरता है 
जीस्त यूँ बार बार,
बिखरने नहीं 
देती हर 
पल तेरी नज़ाकत मुझे - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/


 painting by F. Henderson