Tuesday, 20 November 2012

न जाने क्या था - -

उठा कुछ इस तरह, हिजाब उसके 
चेहरे से, गोया बिखरती हो
ख़ुश्बू, रात गहराए 
जास्मिन की 
नाज़ुक 
शाख़ों से ! बेहोश से जिस्म ओ -
ज़ेहन, वो चांदनी थी या 
कोई  ख़ुमार आलूद 
साया, इक 
अनचाहा ख़ूबसूरत नशा, या राज़ 
पोशीदा, ख़ुदा जाने वो क्या 
था, इक तलातुम 
ज़िन्दगी को 
दे गया - - 

- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
moonlit flower