Wednesday, 10 October 2012

न जाने क्यूँ - -

बाद ए नसीम बहे मुद्दत गुज़र गए,
कहीं से आए फिर मन्नतों की 
सुबह, फिर खिले ख़ुश्क
फूल, कुछ इस तरह 
से मुड़ गए सभी 
अब्र मर्तूब, 
गोया पहचानते भी न हों बियाबां -
क़दीम, कोई भटके राह ए 
गर्द आलूद, कोई वली
अहद, क्या ख़ूब
है नसीब
ए तक़सीम, उसकी नज़र में जब
हैं सभी यकसां, न जाने क्यूँ 
है फिर फ़र्क ज़माने की 
नज़र में इतना - -

- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
बाद ए नसीम - सुबह की हवा 
अब्र मर्तूब - सजल बादल 
क़दीम - प्राचीन 
वली अहद - राजा 

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