Thursday, 25 October 2012

दो लफ्ज़ - -

नज़र के परे भी वो मौजूद, निगाह के 
रूबरू भी ! इक अजीब सा ख़याल
है, या कोई हक़ीक़ी आइना !
ज़िन्दगी हर क़दम 
चाहती है ख़ुद -
अज़्म की 
गवाही, कोई कितना भी चाहे, नहीं 
मुमकिन क़िस्मत से ज़ियादा
हासिल होना, मुस्तक़िल
है मंज़िल, फिर क्यूँ 
परेशां है ये नज़र 
की आवारगी, 

- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
 ख़ुद - अज़्म - स्व आकलन 
मुस्तक़िल - स्थायी 
Light-of-Dreams painting by Walfrido Garcia