Tuesday, 2 October 2012

उफ़क़ के नज़दीक - -


मुन्नवर किस नूर से है दिल की ज़मीं 
कौन दे गया अचानक, तजदीद 
हयात आज की रात, फिर 
लौट आ रही हैं खोयी 
हुई सदाएं ! न 
जाने 
कौन रख गया दहलीज़ पर गुल -
शबाना, महक चले हैं दिल 
ओ ज़मीर बातरतीब,
फिर ज़िन्दगी में 
है ताज़गी
रवां !
फिर करवटें लेता मेरा रूठा नसीब !  
फिर सुबह उभरने को है 
बेताब, कोई है खड़ा 
उफ़क़ के बहोत 
क़रीब, ले 
हाथों 
में रौशनी बेशुमार, फिर आने को है 
बहार - - 

- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
मुन्नवर - रौशन 
तजदीद हयात - पुनर्जन्म 
गुल शबाना - रात के फूल 
उफ़क़ - क्षितिज 
feelings