Monday, 3 September 2012

शब ओ रोज़


ज़ख्मों का हिसाब न पूछ मजरूह ज़िन्दगी से,
बमुश्किल संभला है मेरा वजूद तबाही के बाद,
अभी तलक हैं ख़राश, ज़मीर की गहराइयों में,
बाक़ी कुछ भी न रहा, वक़्त की गवाही के बाद, 

हूँ क़ैद अपने आप में इस क़दर, शब ओ रोज़ -
खौफ़ नहीं किसी से अब ग़म ए स्याही के बाद, 

रग रग में बह चले हैं ज़हर बुझे तीरों के असर 
लज्ज़ते ज़िन्दगी बढ गई है आवाजाही के बाद,

दिन ब दिन बढ़ने लगी है,प्यास कुछ ज़ियादा -
दीवानगी ख़ुलेआम, बारहा यूँ  मनाही के बाद , 

- शांतनु सान्याल
painting by Arnold Bocklin 1827-1901