Friday, 28 September 2012

तूफ़ान दायमी - -


मुश्किल है, बहोत तक़दीर का बदलना,
चाहो तो लौट जाओ, अभी तलक 
बाम ए हसरत पे चिराग़
नहीं रौशन, अभी 
शाम घिरने 
में है 
कुछ देर और बाक़ी, ये ख़ुदकश अंदाज़ -
कहीं कर न जाए तुम्हें बर्बाद 
मुकम्मल, रहने भी दो 
नाज़ुक दिल को 
अध खिले 
गुल की मानिंद, कहीं सुलग कर ख़ाक न 
हो जाए, बहोत जानलेवा है ये इश्क़
शबनमी, छीन लेगी ख़ुशगवार 
सुबह, रख जाएगी इक
तूफ़ान दायमी,
दिल के 
बहोत अन्दर, छोड़ जाएगी कोई बेतरतीब 
निशां, बेइन्तहा उम्र भर के लिए - - 

- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
बाम - छत 
खुदकश - आत्मघाती 
दायमी - दीर्घकालीन 
art by Tim Shorten