Friday, 21 September 2012

अधूरा सफ़र - -


बहोत मिन्नतों के बाद हासिल थी दुआओं 
की रात, बाहम निकले थे दूर लेकिन 
मंज़िल पा न सके, बहोत
नज़दीक थी ख़्वाब
ओ ख़याल की 
दुनिया,
महज़ दस्तकों से लौट आईं दिल की बात -
चाहा लाख लेकिन दर्द अपना उसे 
दिखला न सके, चार क़दम 
थी तोहम आस्ताना, 
उसपार फिर भी 
जा न सके, 
बाहम निकले थे साथ साथ किसी अजनबी 
सफ़र में, रात गुज़री, दिन बीते,
मौसम ने बदली करवटें,
उम्र ने ओढ़ा झुर्रियों 
का लबादा, 
बहोत
क़रीब सांस रोके रही ज़िन्दगी, न जाने क्यूँ 
फिर भी उसे अपना बना न सके - - 

- शांतनु सान्याल  
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
बाहम - दोनों 
तोहम आस्ताना - मायावी दहलीज़ 
no idea about painter 2