Sunday, 2 September 2012


कल्पना से परे 

वो दहन जो जिस्म ओ जां से गुज़र रूह तक पहुंचे,
तिश्नगी जो अनंतकाल तक न बुझे, इबादत 
वो, जिसकी महक बिखर जाए सातवें 
आस्मां तक, बहोत मुश्किल है -
मेरे दोस्त ! मुहोब्बत का 
जावेदां होना, 
फिर भी न जाने क्यूँ तलाशती है नज़र, आँखों -
में तेरी कल्पना से परे दुनिया, वो जो 
ग़ायब होके भी है पेश दर पेश,
कहाँ आसां इतना, इक 
मुश्त ख़्वाबों का 
अब्र आलूद 
आस्मां होना - - - 

- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

 art by Macpherson