Monday, 17 September 2012

हर चीज़ अपनी जगह - -


हालात का रोना अपनी जगह, कभी मिटटी  
कभी सोना अपनी जगह, ख़ुद से बाहर
तो निकलने दे मुझको, इक मुश्त 
बादल की तरह कभी तो 
बिखरने दे मुझको, 
तक़दीर से 
कैसी 
शिकायत, हर सांस नाज़ुक इक शीशे का -
खिलौना अपनी जगह, इस ख़ौफ में 
तमाम रात नींद थी, मुझसे यूँ 
दामन बचाए दूर दूर,
कहीं छू न जाए 
साया भी 
मेरा 
मनहूस, तेरी मुहोब्बत का मिशाल कहाँ, हर 
पल जीना हर लम्हा मरना अपनी 
जगह, दुनिया की नज़र में हूँ 
मुक़द्दस पैकर, आधी 
रात गिर कर 
संभलना
अपनी जगह, न कोई रौशनी न ही सुलगते 
अंगारे, ख़ामोश जिस्म का दहकना 
अपनी जगह - - 

- शांतनु सान्याल
Brian’s PAINTING