Saturday, 15 September 2012

बाहोश जिस्म - -


इक वसीअ ख़ामोशी, दूर, हद ए नज़र तक,
पुरसुकून समंदर कोई हो ठहरा सा, 
उनकी निगाहों में, तामीर ए 
कायनात से पहले ! वो 
मुख़ातिब हैं या 
उतरा है, 
मुक्कमल सितारों का जहाँ, ज़मीं पे आज
रात, उन झुकी पलकों में फिर सज 
चले हैं आसमानी ख़्वाब, ये 
उनकी मुहोब्बत की 
हैं राहें या रूह 
भटकती 
है, बेक़रार सी कहकशां की गलियों में, कोई 
समझाए राज़ ए ख़ुमारी, न शीशा 
कोई, न छलकती हैं मै की 
बूंदे नज़र के सामने,
बाहोश मेरा 
जिस्म 
फिर क्यूँ इस क़दर डगमगा जाए - - - - - - - 

- शांतनु सान्याल
night rain