Wednesday, 8 August 2012

नज़्म

कुछ भी क़ायम कहाँ, ग़ैर यक़ीनी सूरतहाल, 
न फ़लक अपना, न ज़मीं अपनी, न ही
कोई बानफ़स चाहने वाला, बस 
दो पल के मरासिम, फिर 
तुम कहाँ और हम 
कहाँ, इस चाह
को न बांधो 
निगाहों 
में इस तरह कि लौट आये रूह ख़लाओं से -
बार बार, उम्र भर की तिश्नगी और 
सामने समंदर खारा, वो कहते 
हैं, ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा
है बहुत उलझा हुआ,
लेकिन क्या ये 
सच नहीं,
कि सब कुछ ग़र बिन कोशिश मिल जाये 
तो क्या बाक़ी रहे, जीने का मज़ा - -

- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/


art by Marcus Krackowizer