Tuesday, 14 August 2012

सफ़र ए तीरगी


वो सुबह जिसकी तलाश में ताउम्र खुली -
रहीं निगाहें, न रात ही ढली न तुम आये,

तक़रीबन उजड़ने को है,दिल की दुनिया
न तुमने कुछ कहा, न हम ही जान पाए,

वो राज़ जो दफ़न हैं जनम लेने से पहले
नदारद है रूह,सिर्फ़ बैठे हैं जिस्म सजाये,

तुम भी अलहदा कहाँ हो, दौर ए जहाँ से
नाहक़ किसी के इश्क़ में यूँ आंसू बहाए,

रात ओ मेरा वजूद हैं, हम आहंग बहोत -
काश, सफ़र ए तीरगी  तन्हा गुज़र जाये,

- शांतनु सान्याल

http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
painting by CAROL SCHIFF