Saturday, 21 July 2012


निगाह ए बागबान

अधूरा सफ़र ज़िन्दगी का, लाख चाहो मंज़िल नहीं आसां, 
हर मोड़ पे नयी चाहत, हर पल आँखों से ओझल कारवां,

न मैं वो जिसकी तुझे तलाश, न तूही वो जिसकी है आश,
कुछ भी मेरा नहीं, इक *शिफ़र है, बीच ज़मीं ओ आसमां,

जब चाहे पलट जाओ जब चाहे तोड़ दो, है *माहदा नाज़ुक 
कांच के रिश्तों में है, रफ़्तार ए ज़िन्दगी हर साँस यूँ रवां,

न सोये न ही जागे से हैं जज़्बात, सिर्फ़  दरमियानी सोच, 
गुल खिले तो झड़ना है तै, मजबूर से हैं निगाह ए  बागबां,

- शांतनु सान्याल 


अरबी / फारसी शब्द 
*माहदा - अनुबंध
*शिफ़र - शून्य