Sunday, 29 July 2012


दो पल ही सही 

चलो जी लें ज़रा, भीगे लम्हों में दो पल 
फिर कल ये बदलियाँ घिरे न घिरे,
किसे ख़बर कब तक रुके, ये 
बंजारों के ख़ेमे, आज 
गुज़र जाएँ  दो 
स्तंभों के 
दरमियाँ, बेखौफ़ इस तरह कि आह भर 
उठे ज़िदगी की स्याह गहराइयाँ, 
न कोई सबब पूछ मेरी 
गुस्ताख़ियों का,
बिखर भी 
जाने दे,
मुझे वादियों में प्यासे सावन की तरह !

- शांतनु सान्याल  
painting by Thomas Kinkade 2
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/