Monday, 23 July 2012

पुनर्मिलन की संभावना

मुहाने के तरफ बह चलीं सभी नौकाएं !
उदास बरगद, स्थिर सी हैं झूलती 
जटाएं, मंदिर सोपान छूना 
चाहे उद्वेलित नदी -
धारा, पीतवर्णी
उत्तरीय 
दिगंत रेखा पर त्याग, बढ़ चला सूर्य -
आकाश पथ पर एकाकी, दिवा -
स्वप्न लिए जीवन बैठा 
रहा किनारे पर देर 
तक, भावनाएं 
या कोई 
पुरोहित करे नीरव मंत्रोच्चार, गर्भ गृह 
में पाषाणी भाव जैसे हो चले हों 
जागृत, सतत परिक्रमा !
जन्म व मृत्यु, कभी 
अंधकार आगे 
और कभी 
आलोक, बिहान और सांझ के  दरमियान
एक संधि, अविराम बहाव महा -
सिन्धु की ओर, परिपूर्ण 
निमज्जन, महा 
अपरिग्रह,
निखिल निवृत्ति, न कोई निकट, न कोई 
अपरिचित, सभी चेहरे मुखौटे विहीन,
सभी अपने और सभी पराये, 
अंतहीन पथ के पथिक 
सब, संभव है पुनः 
मिले किसी 
घाट पर,
अप्रत्याशित छिन्न पालदार नौकाओं के साथ - - 

- शांतनु सान्याल
river and reflection