Wednesday, 18 July 2012


सजल मुस्कान 

सघन वर्षा के उपरांत फिर खिली है धूप 
या रहस्यभरी मुस्कान कोई, दे रही 
पुनः  दस्तक ; हृदय द्वार खुल 
चले हों जैसे अपने आप,
ये कैसा चित्रलेख,
गुलाब के 
पंखुड़ियों में ठहरे हुए बूंदें हैं, या किसी के 
सजल व्रत, कौन दे गया बिहान के 
धुंधलके में चुपके से प्रणय 
पत्र ; या फिर कोई 
निशि पुष्प है 
बेचैन 
सुप्त गंध लिए सीने में, फिर सुरभित हैं 
देह प्राण - - 

- शांतनु सान्याल 
 One-Rain-Drop-Leaf
http://sanyalsduniya2.blogspot.in/