Thursday, 5 July 2012


नज़्म 

फिर मिलें न मिलें किसे ख़बर, कुछ पल और
देख लूँ ज़रा, ऐ ज़िन्दगी तुझे क़रीब से,
फिर झर रही है चांदनी; दर्दे मेहराब
से, यूँ रुक रुक कर, गोया छू
जाए है ; ज़ख्म ताज़ा 
कोई, न जा दूर 
कहीं; कि
सुन न  पाए सांसों के तरन्नुम, अभी अभी तो -
जगे हैं सभी सोये हुए अरमां, ख़ुमार -
आलूदा जज़्बात को ज़रा और 
संभल जाने दे, कुछ देर 
यूँ ही और जले
निगाहों के 
शमा, कुछ और नज़दीकियों को पिघल जाने दे,

- शांतनु सान्याल  
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