Saturday, 23 June 2012


पुराना आईना 
वो हदे नज़र नहीं, लेकिन छू जाय है; दिल की 
गहराई, ये कैसा भरम मेरा; चल रहा हूँ 
ज़मीं पर; और आसमां छू रही 
मेरी परछाई, न चाँद, न 
सितारे, न ही कोई 
आकाशगंगा,
फिर भी है जिस्मो जां रौशन, न जाने कौन 
पिछले पहर भर गया; ख़ुश्बुओं से मेरी 
तन्हाई, लिख  गया ज़िन्दगी के
रिक्त पृष्ठों पर नयी 
कहानी, ये फिज़ा;
ये सुबह; सभी 
तो थे 
रोज़ मौजूद, फिर क्यूँ पूछता है; मेरा नाम 
आईना पुराना - - 
- शांतनु सान्याल  
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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