Friday, 25 May 2012


कोई क़दम तो बढ़े
कोई तो उठे बज़्म से ललकारते हुए 
कि लपक जाए दहकता शोला, 
कोई तो आए लहराके यूँ 
बादलों की तरह 
राख़ होने से 
बच भी  जाए किसी का आशियाना, -
न पूछ ऐ दोस्त मेरी ज़िन्दगी 
की हकीक़त, इक आइना 
है जो टूट कर भी 
बिखरने नहीं 
देता मेरा 
वजूद, कि हर बार खाक़ से उभरता 
हूँ मैं तूफ़ान की तरह - - - 

- शांतनु सान्याल
painting by MARIE