Wednesday, 23 May 2012


ग़र मिल जाए कोई 

ये ख़ामोशी अब लाज़िम नहीं कांपते लबों को
फिर ज़बां मिल जाए,

रात का सफ़र और धड़कता दिल, काश कोई 
तो कारवां मिल जाए,

सीने में लिए फिरता हूँ रौशनी का शहर, कहीं 
से आसमां मिल जाए,

क़िस्मत का सितारा डूबा नहीं, भूले से सही,
इक क़द्रदां मिल जाए,

- शांतनु सान्याल

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/


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