Tuesday, 22 May 2012


आवाज़ न दे कोई 
ये कैसे  ख़ुमार लिए रात भर गई जिस्मो जां,
है ज़माना बहोत दूर सहमा सहमा; और 
हम बस चले हैं रफ़्ता रफ़्ता जैसे 
लबे कहकशां, न दे हमें 
आवाज़ कोई कि
हमने छोड़ 
दी है ;
नफ़रतों से सुलगती वो जहां, इन ख़लाओं
में है न जाने क्या तिलिस्म गहरा,
जितना ही डूबते जाएँ उतना 
ही उन निगाहों में बढ़े
कोई राज़ 
बेक़रां, 

- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
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