Tuesday, 15 May 2012


निराकार सत्ता 

तृष्णा व  मृगजल के मध्य जीवन, कदाचित 
खोजे शीतल तरु छाया, कुछ प्रणय बूंदें, 
कुछ वास्तविक, कुछ स्वप्नील 
माया, उन तुहिन कणों में 
थे; छुपे व्यथा कितने 
खिलते पुष्पों को 
ज्ञात नहीं, 
गंध कोषों में भरे फिर भी उसने सुरभित -
भावनाएं, वक्षस्थल में सजाये नभ 
ने अनगिनत ज्योति पुंज;
तमस घन रात्रि ने 
किंचित कहा 
हो; धन्यवाद या नहीं, कहना है कठिन, फिर 
भी पुनः पुनः आकाश फैलाये अपनी 
बाहें, वृष्टि वन हों या धू धू 
मरू प्रांतर, उसकी 
प्रतिछाया 
अदृश्य होकर भी करे प्रतिपल आलिंगनबद्ध !

- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
Night Sky Painting by Rebecca Fitchett