Saturday, 12 May 2012


काश वो मिल जाये 

न जाने क्या मज़बूरी थी उसकी, ख़ामोश
निःशब्द, वो गुज़र गया मेरे पहलू
से होकर यूँ ; जैसे हाथों से 
छूट जाय किसी की
उँगलियाँ डूबने 
से पहले, 
मेरी सांसों के साहिल पर था वो खड़ा दूर !
आवाज़ मेरी लौट आई मजरूह 
हमेशा की तरह; वो 
शायद था 
अपनी 
ही जहाँ में मसरूफ़, बहोत चाहा कि छू लूँ 
उसे, लेकिन उस भंवर से निकलना 
न था आसां, न उसने ही हाथ 
बढ़ाया, न  ज़िन्दगी ने 
साथ निभाया,
वो शख्स  
अँधेरे में आख़िर गुम होता गया; बहोत 
दूर - - - 

- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/ 
Rising Moon by Clifford T. Bailey