Friday, 28 December 2012

नाख़ुदा कोई नहीं - -

उठे फिर कहीं से सघन बादलों के गरदाब, 
ज़िन्दगी चाहती है फिर ऐ तक़दीर 
तुझे आज़माना, न रख 
मुझे अपने दायरे 
में बाँध कर,
चाहता है ज़मीर मेरा, ख़ुद से निकल कर,
तूफ़ान को बहोत क़रीब से पहचानना, 
नाख़ुदा न कोई, न ही साहिल 
मेहरबां, ज़िन्दगी फिर 
भी चाहती है हर 
हाल में 
मंजिल ए मक़सूद तक पहुंचना, ज़माने -
की अपनी हैं शर्ते, अपनी ही 
मजबूरियां, रहने भी 
दे, ऐ आसमां 
रहनुमाई,
दिल की रौशनी है अभी बाक़ी, है अभी 
अधूरा सफ़र तीरगी का, है अभी 
बाक़ी, ऐ हमनफ़स तुझे 
मुक्कमल तौर से 
अपनाना !
* * 
- शांतनु सान्याल 
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नाख़ुदा - माझी
गरदाब - भंवर 
alone boat -ART by ROB FRANCO 




Thursday, 27 December 2012

सुलगता अहद - -

न बुझा वो अहद सुलगता जो कभी -
हमने उठाई थी यकजा, रहने 
भी दे भरम कुछ तो तेरी 
सदाक़त का, अभी 
तलक है 
मेरे दिल में मौजूद, मुक़द्दस आतिश, 
रहने भी दे ज़रा कुछ देर यूँ ही 
रौशन यक़ीन तहारत 
का, जिस्म की 
है अपनी 
ही मजबूरी, इक दिन तो होगी सुपुर्द 
ए ख़ाक, न कर अलहदा रूह 
ए लामहदूद, रहने भी 
दे उसे ज़िन्दा, 
अपनी 
धडकनों में, कुछ तो मिले नेअमत 
उम्र भर की इबादत का,
* * 
- शांतनु सान्याल 
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तहारत - शुद्धता 
नेअमत - आशीष 
सदाक़त - वफ़ादारी 
 अहद -  शपथ 
अलहदा - अलग 
लामहदूद - अंतहीन 
Painting by Lanjee Chee

Tuesday, 25 December 2012

अह्तराक़ मुसलसल - -

अपलक देखते रहे, न लब ही खुले, न ही 
साँस को कोई राहत, इक ख़ामोश 
लहर बहती रही दरमियां 
साहिल ओ समंदर, 
वो सिफ़र 
था या 
दर तमाम कायनात, वजूद मेरा उस - - 
निगाह में डूबता गया, न जाने 
कहाँ है वो आख़री नुक़ता,
जहाँ हो मुकम्मल 
मेरी चाहत, 
मंज़िल 
दर मंज़िल, इक तलाश बेपायां, लम्हा 
दर लम्हा अह्तराक़ मुसलसल,
बेअसर हैं सभी बारिशें 
आसमां की - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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सिफ़र - शून्य 
कायनात - ब्रह्माण्ड
नुक़ता - बिंदु  
बेपायां - अंतहीन 
अह्तराक़ मुसलसल - लगातार दहन 
Painting by John Atkinson Grimshaw 2

Friday, 21 December 2012

मस्मुमियत दर्दनाक !

तीर कोई जो गुज़रा है, दिल के पार अभी,
ख़ामोश बग़ैर इशारा, संभल भी पाते 
कि कर गई मजरुह जिस्म ओ 
जां, किसी की इक नज़र,
अभी तलक है इक 
मस्मुमियत 
दर्दनाक !
इलाज ए दायमी नज़र न आए दूर तक !
ज़िन्दगी फिर है परेशां, न है ज़मीं 
हमदर्द और न ही आशना ऐ 
आसमां, ये वजूद 
है मेरा या 
ग़ैर मुतमईन भटकती रूह ए क़दीम - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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मस्मुमियत - नशा 
दायमी - दीर्घ 
ग़ैर मुतमईन - अतृप्त 
क़दीम - प्राचीन 
 Dzign Art

Thursday, 13 December 2012

अन्दाज़ ए महलक - -

न देख फिर मुझे फिर वही 
अन्दाज़ ए महलक 
नज़र से,
अभी 
अभी उभरा हूँ मैं तबाहकुन 
तूफां के असर से,
दूर तलक हैं 
बिखरे 
दर्द ओ ग़म के क़तरे, फिर 
भी हैं तेरी आंखे न 
जाने क्यूँ इस 
क़दर 
बेख़बर से, ज़रा कुछ देर तो 
सही, सजने दे मजलिस 
ए  सितारा, जिस्म 
ओ जां अभी 
तक हैं 
कुछ तर बतर से - - - - - - 
* * 
- शांतनु सान्याल  
अन्दाज़ ए महलक - घातक अन्दाज़ 
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cloudy night - art by ab

Monday, 10 December 2012

बेकरां चाहत - -

अभी तलक मेरी आँखों में हैं 
तेरी परछाइयाँ, झुलसते 
सहरा में भी है सुकूं 
ओ राहत मुझे,
नुक़ता 
नज़र के असूल जो भी हो -
जहान के, उजड़ने नहीं 
देती, यूँ तेरी बेकरां
चाहत मुझे,
गिरफ़्त
ए गर्दबार से भी उभरता है 
जीस्त यूँ बार बार,
बिखरने नहीं 
देती हर 
पल तेरी नज़ाकत मुझे - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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 painting by F. Henderson 

Friday, 7 December 2012

ज़िंदगी का रुख़ - -

अनजाने ही हम बहुत दूर यूँ आ गए कि 
मुमकिन नहीं, बाहमी क़रार तोड़ देना,

दर चश्म अंदाज़ हैं, उभरते कई  ख़्वाब 
मुश्किल है,लेकिन सारा जहाँ छोड़ देना,

तूही नहीं, इक मक़सद ए ज़िन्दगी मेरी,
आसां कहां, सब ख़ुशी तुझसे जोड़ देना, 

तरजीह की कसौटी है, यूं उलझन भरी -
नहीं लाज़िम ज़िंदगी का रुख़ मोड़ देना !

- शांतनु सान्याल 
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art by Petra Ackermann

Thursday, 6 December 2012

हमें मंज़ूर नहीं - -

कर सके तो करो मुझे अहसास, अभी इसी पल,
जां तो महज है उठती गिरती सांसों का 
इक ताना बाना, हमने तो रूह 
तक लिख दी तुम्हारे 
नाम, नतीजा 
जो भी 
हो इस दीवानगी का, आतिशफिशां कहो या -
कोई और सुलगता सा तुफ़ान, इक 
जूनून ए फ़िदा है मेरी चाहत,
आसमां से भी लौट 
आती है हर 
दफ़ा, दे  
दस्तक दरब इल्ही, कि तुमसे अलहदगी हमें 
मंज़ूर नहीं - - 
* * 
- शांतनु सान्याल 
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दरब इल्ही - स्वर्ग द्वार 
Painting by Jurek Zamoyski 

Tuesday, 4 December 2012

आधी रात - -

झिझक कैसी, आईना पूछता है आधी रात 
बेलिबास हैं सभी नक़ाबपोश यहाँ 
कह भी जाओ अपनी दिल 
की बात, इतना भी 
घुमावदार नहीं 
ज़िन्दगी,
मुश्किल नहीं बयां करना फिर क्यूँ हैं यूँ -
ख़ामोश तुम्हारे जज़्बात, हकीक़त 
ओ ख़याल के दरमियां फ़र्क़ 
अपनी जगह, चेहरा 
दर चेहरा छुपे 
हैं कई 
वजूहात! न ढक यूँ मासूमियत से, हंसी के 
कोहरे में दिल की चाहत, कि आँखें 
ख़ुद ब ख़ुद बोलती हैं राज़ -
-ए - तिलिस्मात !
* * 
- शांतनु सान्याल 
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painting by ROBERT SHAW



Wednesday, 28 November 2012

दो लफ्ज़

वो अभी तलक है सांसों में शामिल, बेइन्तहा 
इक जावेदान ख़ुश्बू की तरह, कोई भी 
चेहरा नहीं दर मुक़ाबिल उसके,
उस बाज़ताब चश्म में मैंने 
देख ली सारी दुनिया,
अब हर एक 
नज़र 
है बेमानी उस ख़ूबसूरत निगाह के सामने - - !
- शांतनु सान्याल
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 alone sailor - - no idea about artist


Tuesday, 27 November 2012

हमदर्द नज़र - -

इक इंतज़ार जो दे जाए ज़िन्दगी को 
ख़ुशगवार मानी, इक शाम 
कभी ग़लती से ही सही 
लिख जा मेरे 
नाम - - 
कब से हैं मअतर जज़्बात के दरिचे,
कोई लम्हा रख जा मेरी सुर्ख़ 
निगाहों में शबनमी 
ख़्वाब की 
तरह,
मालूम है मुझे रेगिस्तां की हक़ीक़त !
कभी किसी दिन के लिए मेरी 
जां, भिगो जा पल दो पल 
के लिए वीरां पड़े 
ज़िन्दगी के 
रास्ते,
किसी भूले हुए बादलों के मानिंद, कि 
तकती हैं, उदास आँखें तेरी 
इक हमदर्द नज़र के 
लिए - - 

- शांतनु सान्याल  
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art by Francine Dufour Jones

Friday, 23 November 2012

अहसास ए गुलदान - -

नफ़्स मेरा निजात पा न सका, बड़ी 
नफ़ासत के साथ उसने सजायी 
अहसास ए गुलदान, कुछ 
तो है उसकी इसरार 
आमेज़ निगाहों 
की रौशनी 
में, ज़िन्दगी हर क़दम संवर जाती 
है बिखरने से पहले, वो शख्स 
जो मुझे ले जाए अक्सर 
तसव्वुर  से आगे,
किसी और 
ही जहान में, जहां गुलज़ार हैं सभी 
गुल ओ ख़ार, अपनी अपनी 
अंदरूनी ख़ूबसूरती 
लिए हुए - - 

- शांतनु सान्याल 
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इसरार 
आमेज़ - रहस्यमयी 

painting by BARBARA FOX 2

Tuesday, 20 November 2012

न जाने क्या था - -

उठा कुछ इस तरह, हिजाब उसके 
चेहरे से, गोया बिखरती हो
ख़ुश्बू, रात गहराए 
जास्मिन की 
नाज़ुक 
शाख़ों से ! बेहोश से जिस्म ओ -
ज़ेहन, वो चांदनी थी या 
कोई  ख़ुमार आलूद 
साया, इक 
अनचाहा ख़ूबसूरत नशा, या राज़ 
पोशीदा, ख़ुदा जाने वो क्या 
था, इक तलातुम 
ज़िन्दगी को 
दे गया - - 

- शांतनु सान्याल 
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moonlit flower 

Thursday, 15 November 2012

रूह कामिल - -

पैमाना जो भी हो किसी की नज़र में,
वो शख्स कोई दूसरा नहीं मेरे 
अलावा, जो खौफ़ज़दा
सा है ख़ुद की 
नज़र में, ऐतराफ़ करना था बहोत - 
मुश्किल, अक्स था वाज़ी 
अपनी जगह, इक 
लम्बी सी 
फ़हरिस्त नाज़ुक हर्फ़ों में लिखी, वो 
लापता हिसाब या था कोई 
उम्र भर की पोशीदा 
नक्क़ासी,
उभरती रही बारहा छुपाने के बाद ! 
इक साया सा है, जो कर 
जाता है परेशां, हर 
क़दम जिंदगी 
चाहती है, 
इस्लाह  मुसलसल, कोई नहीं यहाँ 
रूह कामिल - - 

- शांतनु सान्याल  
ऐतराफ़ - ख़ुद को पहचानना 
इस्लाह - सुधार 
रूह कामिल - परिपूर्ण आत्मा 
Artist Steven Townsend 
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Sunday, 11 November 2012

निजात - -

बहुत दूर आने के बाद, न करो लौट जाने की 
बात, मुमकिन कहाँ सांसों का वापस 
आना, इक बार ग़र हो जाए
कहीं तबादिल, दिल
ओ जां, अब 
ताउम्र 
ए ताल्लुक़ का बिखर जाना नहीं आसां, ये -
और बात है कि बदल जाओ, राह ए 
मंज़िल अपनी, बहोत ही 
मुश्किल है, अहसास 
ए रूह से यूँ 
निजात 
पाना, ख़ामोश ! ज़िन्दगी से कहीं और यूँ ही 
निकल जाना, हर एक  मरहले पे 
होगी मौजूद, कराह ए 
इश्क़, क़दम 
बढ़ाना 
भी चाहोगे तो साँस उभर आएगी - - - - - - 

- शांतनु सान्याल 
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painting by Felipe D Tapia

Friday, 2 November 2012

आख़री पहर - -

ख़्वाब टूटने का सोग मनाएं क्यूँ कर !
शीशा ए ख़याल था सो टूट गया, 
अभी तक उम्मीद है मेरी 
बाक़ी, ज़िन्दगी में 
फिर अनचाहा 
रोग लगाएं
क्यूँ कर, 
इधर से कहीं गुज़रती है आख़री पहर 
कहकशां, यहीं पे कहीं रुकता है 
चाँद घड़ी दो घड़ी, ये तेरे 
सफ़ाफ़ चश्म हैं या 
कोई पोशीदा 
मुसाफ़िरख़ाना, हर क़दम राज़ गहरा !
हर जानिब छाए संदली धुआं,
सफ़ा दर सफ़ा कोई
लिख रहा हो 
जैसे 
वहमआलूद, इक ख़ूबसूरत  सफ़र ए 
अफ़साना - - 

- शांतनु सान्याल
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सोग - दुःख 
कहकशां - आकाशगंगा 
सफ़ाफ़ चश्म - पारदर्शी आँख 
पोशीदा - छुपा हुआ 
सफ़ा दर सफ़ा - पृष्ठ प्रति पृष्ठ 
वहमआलूद - मायावी 
art of steave phillips 
--آخری پہر

خواب ٹوٹنے کا سوگے مناے کیوں کر!
شیشہ اے خیال تھا سو ٹوٹ گیا،
ابھی تک امید ہے میری
باقی، زندگی میں
پھر انچاها
روگ  لگائیں
کیوں کر،
ادھر سے کہیں گزرتی ہے آخری پہر
کہکشاں ، یہیں پہ کہیں ركتا ہے
چاند گھڑی دو گھڑی، یہ تیرے
سفاف چشم ہے یا
کوئی پوشیدہ
مسافرخانا، ہر قدم راز گہرا!
ہر جانب چھائے صندلی  دھواں،
صفا  درصفا  کوئی
لکھ رہا ہو
جیسے
وهم آلود ، حیرت انگیز زندگی کا
اک افسانہ -

-شانتنو  سانیال

Tuesday, 30 October 2012

नज़्म

तारुफ़ नहीं आसां, ग़फ़लत ए तक़दीर था 
या कोई शहर फिरंगी, उस पैकर ए 
मसीहा ने मुझे लूटा है सरे 
बज़्म कई बार, वो 
सकूत जो कर 
जाए दिल 
ज़ख़्मी, ऐ रफ़ीक़ ए जां, न देख फिर मुझे 
वही ज़माने की नज़र से, बाअज़
वक़्त पिघला है ये जिस्म 
तब कहीं जा कर 
ज़िन्दगी ने 
पायी है 
जलसा ए रौशनी, जलने दे जिगर मेरा
यूँ ही सुबह होने तलक, मद्धम - - 
मद्धम, बिखरने दे मेरा 
वजूद तेरे इश्क़ में 
बूंद बूंद - - 

- शांतनु सान्याल  
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तारुफ़ - परिचय
 ग़फ़लत - अवहेलना 
शहर फिरंगी - बहुरंगी नलिका 
पैकर - रूप 
बज़्म - महफ़िल
 सकूत - ख़ामोशी 
रफ़ीक़ - दोस्त 
बाअज़ - कई 

نظم
تارف نہیں اسا، غفلت اے تقدیر تھا
یا کوئی شہر پھرگي، اس پےكر اے
مسیحا نے مجھے لوٹا ہے سر
بذم کئی بار، وہ
سكوت جو کر
جائے دل
زخمی، اے رفیق اے جاں، نہ دیکھ پھر مجھے
وہی زمانے کی نظر سے، بعض 
وقت پگھلا ہے یہ جسم
تب کہیں جا کر
زندگی نے
پائی ہے
جلسہ اے روشنی، جلنے دے جگر میرا
یوں ہی صبح ہونے تلک، مدھم -
مدھم، بکھرنے دے میرا
وجود تیرے عشق میں
بوند بوند -

شانتنو سانیال  
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تارف - تعارف
  غفلت - خلاف ورزی
شہر پھرگي - بهرگي ٹیوب
پےكر - طور پر
بذم - محفل
  سكوت - خاموشی
رفیق - دوست
بعض - کئی
 Kaleidoscope Art

Thursday, 25 October 2012

दो लफ्ज़ - -

नज़र के परे भी वो मौजूद, निगाह के 
रूबरू भी ! इक अजीब सा ख़याल
है, या कोई हक़ीक़ी आइना !
ज़िन्दगी हर क़दम 
चाहती है ख़ुद -
अज़्म की 
गवाही, कोई कितना भी चाहे, नहीं 
मुमकिन क़िस्मत से ज़ियादा
हासिल होना, मुस्तक़िल
है मंज़िल, फिर क्यूँ 
परेशां है ये नज़र 
की आवारगी, 

- शांतनु सान्याल 
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 ख़ुद - अज़्म - स्व आकलन 
मुस्तक़िल - स्थायी 
Light-of-Dreams painting by Walfrido Garcia

Friday, 19 October 2012

शाम ढले - -

ग़ैर मुन्तज़िर बारिश की तरह, शाम 
ढले भिगो जाता है कोई दिल 
की दुनिया, महक उठते 
हैं सभी वीरां गोशे
ज़िन्दगी के, 
इक इंतज़ार ए ख़्वाब सा उभरता है -
मखमली अँधेरे में दूर तक,
कोई चुपके से दीया
जला जाता हो -
माबद 
ए क़दीम में जैसे, तेरी झुकी निगाह में 
रुकी रहती हैं मेरी सांसें, हथेली 
में बंद जुगनू की मानिंद, 
बिखरने को बेताब
इश्क़ ए जुनूं
मेरा - -

- शांतनु सान्याल
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ग़ैर मुन्तज़िर - अप्रत्याशित 
वीरां गोशे - वीरान कोने 
माबद ए क़दीम - प्राचीन मंदिर 
इश्क़ ए जुनूं - प्रेम की आसक्ति 
midnight-splendor by Rick Lawrence

Wednesday, 17 October 2012

तीरगी ए हिजाब - -

वो तलाश जो ले जाए ख्याली दुनिया से परे,
हक़ीक़त की ज़मीं हो ज़ाहिर जहाँ, दिल 
चाहता है, फिर तीरगी ए हिजाब 
हटाना, चलों देखे ज़रा फिर 
बेनक़ाब ज़िन्दगी को 
बरअक्स आइना,
ये झिझक 
कैसी जो रोकती है, तन्हाई में भी लिबास -
बदलना, न जाने किस की निगाह है 
खुली रात दिन, न जाने कौन है, 
दर दाख़िल ओ ख़ारिज 
मुसलसल मौजूद, 
चाहता है, हर 
वक़्त, ज़मीर को मुक्कमल बदलना, राह ए 
उजागर की जानिब बढ़ना, ख़ुद को 
पाक इशराक़ से भरना - - 

- शांतनु सान्याल 
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तीरगी ए हिजाब - अंधकार का पर्दा 
दर दाख़िल ओ ख़ारिज - अन्दर और बाहर 
पाक इशराक़ - पवित्र दीप्ती 
Oil Painting by Marina Petro 1

Sunday, 14 October 2012

सबर बेइन्तहा - -

वो सरुर जो तेरी नज़र से छलके, छू जाए
कभी अनजाने यूँही मेरी ज़िन्दगी को, 
हूँ आज भी लिए दिल में सबर 
बेइन्तहा, दे जाए कोई
नूर ए उम्मीद इस 
ग़म अफज़ा 
ज़िन्दगी को, वो रुकी रुकी सी बात, जो -
लब तलक आ के, ख़ामोश बिखर 
जाए अक्सर, कभी तो खुले 
राज़ ए उल्फ़त गुमशुदा,
इक बूंद तो मिले,
प्यासी मेरी 
ज़िन्दगी को - - 

- शांतनु सान्याल
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सरुर - ख़ुशी 
 सबर  बेइन्तहा - अंतहीन धैर्य
artist Pavel Guzenko
Paintings By American Artist Helena Nelson 

Wednesday, 10 October 2012

न जाने क्यूँ - -

बाद ए नसीम बहे मुद्दत गुज़र गए,
कहीं से आए फिर मन्नतों की 
सुबह, फिर खिले ख़ुश्क
फूल, कुछ इस तरह 
से मुड़ गए सभी 
अब्र मर्तूब, 
गोया पहचानते भी न हों बियाबां -
क़दीम, कोई भटके राह ए 
गर्द आलूद, कोई वली
अहद, क्या ख़ूब
है नसीब
ए तक़सीम, उसकी नज़र में जब
हैं सभी यकसां, न जाने क्यूँ 
है फिर फ़र्क ज़माने की 
नज़र में इतना - -

- शांतनु सान्याल 
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बाद ए नसीम - सुबह की हवा 
अब्र मर्तूब - सजल बादल 
क़दीम - प्राचीन 
वली अहद - राजा 

by artes.sn 

Sunday, 7 October 2012

कोई निशानी - -

रख जा कोई तो निशानी दिल पे मनफ़र्द
ख़ुश्बू की तरह, लिखा है जिस्म ओ 
जां पर किसी का नाम हमने,
लाज़वाल सुलगती इक 
आरज़ू की तरह, 
रंग जाए 
जो रूह तलक, दे जा कोई हिना ए इब्दी 
पुरअसर किसी इल्ही क़ाबू की 
तरह, वो तेरी चाहत कम 
तो नहीं, किसी मसफ़ा
ज़िन्दगी से, ले 
चल फिर 
मुझे चाहे जिधर राह ए निजात की - - -
जानिब !

- शांतनु सान्याल 
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मनफ़र्द - निराली 
लाज़वाल - शाश्वत
 इब्दी - अनंत 
इल्ही - दैवी
मसफ़ा - परिशुद्ध
निजात - मुक्ति 
milky way 1

Saturday, 6 October 2012

इक ख़ालीपन - -

दूर तक फैला रहा इक ख़ालीपन, वो क्या 
गए, ख़ला में भटकती रही ज़िन्दगी,
वीरां से हैं कहकशां के किनारे,
चाँद मद्धम सा, बेरौनक
से सितारे, इक 
आग अन -
बुझी 
सी, यूँ सुलगती रही ज़िन्दगी, उतरती है 
रात बदन ख़स्ता, कोह शोलावर 
से, अहसास ज़ख़्मी, कभी 
जलती कभी बुझती 
रही ज़िन्दगी, 
न पूछ 
किस तरह से सांसों ने की हमसे बेवफ़ाई, 
कभी सहरा, कभी संग ख़ारदार 
हर लम्हा उलझती रही 
ज़िन्दगी - - 

- शांतनु सान्याल
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 कोह शोलावर - जलते पहाड़ 
 संग ख़ारदार - नुकीले चट्टान 
art by Le Dernier Homme