Sunday, 23 October 2011


कांच के उपहार 

समझौता कहें या  मजबूरी , शब्दों की है 
कारीगरी, वास्तविकता ये है कि
उन दो स्तंभों के मध्य की
दूरी, रस्सियों से थी 
पूरी, ज़िन्दगी 
ने जिसे तय किया ,व्यक्तित्व मेरा क्या 
था , क्या है, कभी समय मिले 
तो चेहरे के लकीरों से 
पूछ लेना, 
प्रतिबिम्ब की अपनी सीमायें थीं, वो 
चौखट पार कर न सका, खुल कर 
नग्न हो न सका, यही वजह थी 
शायद, कि सोने के दाम
बिक न सका, कांच 
के पुरस्कार ही 
सही, कभी जो हाथ से फिसल पड़े तो टूटने 
का दुःख नहीं होगा, जिनके बदन हों 
तीरों से बिंधे हुए, बिखरे कीलों 
पर  चलने का उन्हें भय 
नहीं होता, इधर से गुज़रते हैं कुछ सहमे 
सहमे बादलों के साए , कहीं टूट 
कर बिखर न जाएँ , ये 
उनकी अपनी 
सोच है, 
धूप  व छाँव का बटवारा करें जितना चाहें,
खंडहर से भी उठती हैं साँसें , छूतीं 
हैं चाँद की छाया , ग्रहण में 
भी खिलती हैं ,भावनाओं की निशि कमलिका,
जीवन प्रवाह रोके नहीं रुकता , ये बात 
और है कि हर कोई परिपूर्ण समुद्र 
पा नहीं सकता, एक ही 
जीवन में अनेक 
जीवन 
जी नहीं  सकता, दोबारा हलाहल पी नहीं सकता .

-- शांतनु सान्याल 



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Saturday, 22 October 2011


मृगजल 
तुम चाहे जितना भी चाहने का दम भरो,
मरने मिटने की क़सम खाओ,
सरीसृप से विहग बन न 
पाओगे,  ये अंतर्मन 
की बात है,
रंगीन शल्कों से चाहे जितना भी ढक लो तन 
अपना, वो नैसर्गिक आभा ला न 
पाओगे, छद्म आवरण से 
मुक्ति न पा सकोगे,  
 मुझे पाने की तुम्हारी चाहतें रुक जाती हैं 
मांस पेशियों, रक्त कणिकाओं तक 
आ कर, वृष्टि छाया के उस पार 
बहती है शुष्क अतृप्त नदी 
कोई, ह्रदय तंतुओं में 
बसते हैं, 
पलाश वन लिए शताब्दियों के प्रज्वलन 
 तुम चाहे अनचाहे अनंत मेघ 
बन बरस न पाओगे, थक 
हार के एक दिन, प्रति -
ध्वनि के पथ हो 
निशब्द, सुदूर शून्य में लौट जाओगे, चाह कर 
मुझे अपना न पाओगे, तृषित थे यूँ  भी 
युगों युगों से, मृगतृष्णा में पुनः 
खो जाओगे, लाख कोशिश 
करो लेकिन मुझसे न 
कभी मिल 
पाओगे, 
-- शांतनु सान्याल  
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

Thursday, 20 October 2011


क्या हुआ कि हार जाता हूँ मैं --

अंतिम प्रहर की उन निस्तब्ध पलों में -
क्लांत रात्रि उतार जाती है उतरन,
कुछ फीके फीके आलोकपुंज 
चंद्राकार माथे का टिका,
झरित निशि पुष्पों 
का झूमर,
कुछ उदासीन देह गंध, श्रांत चन्द्रिमा, -
फिर भी ऐ ज़िन्दगी, मन चाहता 
तुम्हें आलिंगनबद्ध करना, 
सांसों में चिरस्थायी 
भरना, चुम्बनों 
से नए गीत 
रचना,
ये मेरी अभिलाषा कहो या वासना, मुझे -
कोई अंतर नहीं पड़ता, मैं चाह कर 
भी उसे यूँ व्यथित, आहत छोड़ 
नहीं सकता, तथागत बन 
नहीं सकता, एक 
अदना बूंद हूँ 
मैं, मुझे 
इसकी ख़बर है, लेकिन  बूंदों से ही भरते 
हैं समुद्र गहरे, खिलते हैं कंटीली 
झाड़ियाँ, उभरते हैं नव स्वप्न 
भीग कर शिशिर कणों
से, मैं जीवन को 
हर बार सजा 
जाता हूँ -
क्या हुआ कि हर पल हार जाता हूँ मैं --

-- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
painting by thomas schaller

Wednesday, 19 October 2011


तुम्हारे सिवाय 

कुछ और भी बांध्य भूमि हैं, अधखिले जीवन,
बबूल से बिंधे कई झूलते पतंग, तुम्हारे 
व मेरे मध्य छुपा हुआ सामीप्य -
वो आवधिक है शायद जिसे 
अनुभव तो किया जा
सके, देखना हो 
कठिन, 
देह से निकल कर सोच कहीं गुम न हो जाए, -
जीवन चाहता है बहुत कुछ जानना, 
महसूस करना, तुम वो गंतव्य 
नहीं जहाँ आवाज़ तो जाए 
मगर दस्तख़त कर, 
यूँ ही  लौट आए 
सहसा, 
चाहता है, मन सजल मेघ अणु बनना, उन 
कुम्हलाये पंखुड़ियों से है पुरानी
प्रतिबद्धता, भावनाओं का 
अनुबंध, मानवीय -
संधि, मैं नहीं 
चाहता 
किसी तरह भी प्रेम में संधिविग्रह, ये सच है 
की मेरी साँसें अब भी उठतीं हैं किसी 
के लिए बेचैन हो कर किन्तु वो 
तुम ही हों कोई ज़रूरी नहीं,
आँखों के परे जो दर्पण 
है खड़ा एकटक, वो 
कोई नहीं मेरा 
ज़मीर है,
जो दिलाता है याद, करता है जीवन अनुवाद.

--- शांतनु सान्याल  
Acacia Sunrise - Marina Jenelle Paintings.




Monday, 17 October 2011


किस्तों में जीने की अदा 

किस्तों में दे जाते हैं वो जीने की हिदायत,
उधार लौटने में कहीं उम्र ही न गुज़र
जाए, उनकी उपहारों में लिखा 
होता है कुछ अजीब सा 
सन्देश, तात्पर्य 
समझने में 
कहीं 
झुर्रियां न उभर आए, मैं अपनी ही छाया 
से स्वयं को बचाए रखता हूँ, कभी 
चेहरा कभी दिल के दाग़,
वास्तविकता व 
दिखावे में 
ज़रा 
सा फ़र्क़ बनाये रखता हूँ, तुम्हारी अपनी 
कुछ मजबूरियां थीं शायद, तुमने 
खींची हैं आतिश की लकीरें, 
इर्दगिर्द मेरे जो ख़्वाब
की थीं बस्तियां 
सुना है 
जा चुके सभी छोड़ कर किसी और शहर 
में, त्याग पुत्र की तरह हैं मेरी 
आजकल शख़्सियत, कर्ण
की तरह मन खोजता 
है कोई दोस्त जो 
बुरा हो कर 
भी दे 
जाय जीवन को नए सन्दर्भ, आयाम 
गहरे, डूबने से पहले ज़िन्दगी 
को जहाँ अफ़सोस न हो,
यहाँ तो हर दूसरा है 
अजनबी चेहरा, 
रग़ों में रह 
भरता  
है दोस्ती का दम, वक़्त आने पर कर 
जाता है किनाराकशी, दे जाता 
है किस्तों में हसी, टुकड़ों 
में ज़िन्दगी.

-- शांतनु सान्याल
 painting  - sunset-harbour-by-stella-dunkley.

Wednesday, 12 October 2011


हासिये में कहीं 

वो परिभाषा जो करती है, रेखांकन से  
मुझे पृथक, वो तुम्हारी सोच है 
वर्ना मन की गहराइयों में
मेरे भी उठते हैं लहर 
किनारे की खोज 
में दूर तलक, भटकती है ज़िन्दगी -
छूने को क्षितिज रेखा, सुना 
है वहीँ कहीं बहती है 
कोई नेह नदी,
छुपाये रहस्य गहरे, खनिज से पिघल 
कर स्वर्ण होने की प्रक्रिया, 
जीवाश्म से जहाँ 
निकलते हैं 
मोती, 
मैं सीप सा खोले वक्ष स्थल, हूँ खड़ा 
उसी तटभूमि के करीब, जहाँ 
कभी तुमने ली थी सपथ,
रौशनी में ढलने की 
अभिलाषा, 
किया था हस्ताक्षर उस इच्छापत्र में -
सहर्ष, कहा था - कर लो मुझे 
आलिंगनबद्ध अनंत 
काल के लिए,
यद्यपि 
काल तो गुज़र गए मौसमों के ओढ़ में,
न तुम बन सके मोती, न मैं 
बन सका नीलकंठ,
रिक्त शुक्ति 
की तरह 
बिखरे हैं स्वप्न सभी ज़िन्दगी के तीर, 

-- शांतनु सान्याल

painting by Duane Murrin



अधूरी प्यास 

ले चलो फिर मुझे धूमकेतु के पथ से 
गुज़र कर निहारिकाओं के 
शहर में, ऊब चूका हूँ 
मैं दिन रात के 
दहन से,
वही आंसू वही सिसकियाँ, फ़रेब के 
रेशमी फंदे, रिश्तों के हाट
न जाने कितनी बार 
लोग परखेंगे 
 मुझे,
वो जो बहती जा रही है जीवन नौका 
बिन माझी बिन मस्तूल, रोक 
भी लो मेरी सांसें बिखरने 
से पहले, कोहरों ने 
शर्त रखी है 
डूबाने की ख़ातिर, इक रात ही की बात 
है, खोल भी दो इत्र की शीशी 
बिखर जाने दो  प्रणय 
गंध, भूल जाएँ 
घने धुंध 
रास्ता, मुड़ जाएँ शायद अन्य दिशा में, 
नींद में जैसे चलतीं हों परछाइयाँ 
हूँ मैं आवरणहीन फिर भी 
न जाने तुम चाह कर
भी नहीं चाहते मेरा
व्यक्तित्व
छूना, 
मैं शीशा नहीं कि टूट जाऊं ज़रा सी -
ठेस से, कभी तो करो स्पर्श 
कि ज़िन्दगी है बुझी 
सलाख सी, इक 
अधूरी प्यास 
सी.

-- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

    

Tuesday, 11 October 2011


अनुबंध 

ये सच है कि जीवन इतना सहज नहीं,
दुःख दर्द, व्यथाएं, डूबते उभरते 
इन्हीं क्षणों में इच्छाओं का 
होता है पुनर्जन्म, माया 
जो बनावटी हो कर 
भी दे जाती है 
स्वप्नों के 
बीज, 
यही सजल अनुभूति बचाते हैं भावनाओं
को असामयिक मृत्यु से, मरुभूमि
के पथ में खिलाते हैं थूहर, 
नागकनी, मरूद्यान में 
ले आतें है लुप्तप्राय 
श्रोत, स्वप्निल 
पर्वत, पुष्प 
गंध, 
यहीं कहीं रेतेली टीलों में ज़िन्दगी खोजती 
है प्रेम, अनुराग की बूंदें, अस्तित्व का 
अर्थ, किसी के आँखों से टपकता 
हुआ प्रदीपन, कारवां के
लिए रात्रि सराय, व 
आकाशगंगा,
अंतहीन यात्राओं से लौटते हुए तारक वृन्द 
कहते हैं - डूबना नियति है एक दिन, 
फिर भी टूटने से पहले ज़रा नभ 
को तो कर जाएँ आलोकित, 
अंधकारों से था जो 
अनुबंध - निभा 
जाएँ.

-- शांतनु सान्याल 
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

Monday, 10 October 2011


अनुसंधानी नेत्र 

जीवन के कुछ अभिनव अर्थ
अनदेखे  गंतव्य, बनाते 
हैं मुझे प्रवासी पंछी, 
यायावर सोच 
भटकती है भूल भुलैया की 
सीड़ियों से हो कर कहीं, 
अन्तरिक्ष के शून्य 
में खोजती हैं 
आँखें 
जन्म मृत्यु के रहस्य, दिन व 
रात की चीख, जीने की 
अदम्य, उत्कंठित
गहराई, 
रूप रंग से परे एक भू प्रदेश, 
घृणा, पूर्वाग्रह विहीन एक 
धरातल, जहाँ स्वप्न 
खिलते हों 
निशि पुष्प की तरह, ओष में 
भीगते हों भावनाएं, शेष 
प्रहर में झरते हों 
पारिजात, 
ह्रदय में जागे जहाँ उपासना 
पारदर्शी हों रिश्तों के 
आवरण, स्वर्णिम 
मुस्कानों 
से झरे मानवता की दीप्ति,
मौलिक प्रणय गंध में 
समाहित हों जहाँ 
निश्वार्थ 
अंतर्मन, हर कोई महसूस करे 
भीगी पलकों की तरलता,
कम्पित मन की 
व्यथा, 
मुखौटा विहीन परिपूर्ण धरा.

-- शांतनु सान्याल

http://sanyalsduniya2.blogspot.com/

Landscape paintings - Stuart Kirby 






Monday, 3 October 2011

देखा है तुझे ज़िन्दगी 


पुरनम पलकों से गिरतीं उन बूंदों में कहीं यूँ 
बिखरतासा
देखा है तुझे  ज़िन्दगी 

बड़ा अपना सा लगे है वो पराया हो कर भी 
उन गहरी सांसों में डूबता उभरतासा, कई बार 
देखा है तुझे  ज़िन्दगी

मेरा अपना कुछ भी न था जो मैं दावा करूँ 
नाज़ुक सीड़ियों से गिरता उतरतासा, कई बार 
देखा है तुझे ज़िन्दगी 

अनजाना फ़र्श है ये शफाफ़ शीशे की मानिंद 
उलझन में अक्सर जहाँ फिसलतासा, कई बार 
देखा है तुझे ज़िन्दगी

न जाने वो कौन थे जो खूं रिसते  पांव हैं गुज़रे
इक रहगुज़र रात दिन यूँ सुलगतासा, कई बार 
देखा है तुझे ज़िन्दगी

उनकी अपनी तरजीह की थी शायद फेहरिस्त
हमदर्दी के लिए बेवजह मचलतासा, कई बार 
देखा है तुझे ज़िन्दगी

कोई ताजीर था जो बेच गया जज़्बाती रस्सियाँ
रेशमी फंदों में कहीं दम घुटतासा, कई बार 
देखा है तुझे ज़िन्दगी  -

-- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
photo - Nadia Moro