Friday, 28 January 2011

भूली सुबह की तरह


भूली सुबह की तरह
 
अभी अभी है, चाँद ढला दूर पहाड़ों में 
चाँदनी फिर भी ढकी सी है दूर तक,
तलहटी में उभरें हैं, साँसों के बादल
मन चाहे तुम्हें देखूं अन्धेरें में क़िस्मत 
की तरह, बन जाओ कभी तुम रहनुमां,
 भूल जाऊं मैं मुश्किल भरे ज़िन्दगी के
 रास्ते,कौंधती हैं बिजलियाँ पूरब में कहीं,
बरस भी जाओ किसी दिन, दिल की
 बस्तियां उजड़ने से पहले,कुछ तो मिले 
सुकूं,के उड़ भी आओ कहीं से मसीहा की
 तरह, हर क़दम बोझिल के टूट टूट जाए 
ख्वाबों की सीढियां, मैं चाहूँ तुम्हें छूना 
और तुम हो के बेख़बर भूली सुबह की तरह,

--- शांतनु सान्याल      

Tuesday, 25 January 2011

सूनापन

अरण्य अनल सम जागे मन की
सुप्त व्यथाएं
दूर कहीं टिटहरी टेर जाय
फिर जीवन में दहके बांस वन,
पल छिन बरसे मेह
झर जाएँ मौलश्री
स्थिर ह्रदय को जैसे दे जाए
दस्तक, कोई विस्मृत सन्देश,
भीगी साँसों में कोई चेहरा
उभरे डूबे बार बार
लहरों से खेले चाँद आँख  मिचौली
हिय उदासीन, जस अधखिली
कुमुद की नत पंखुडियां
रह रह जाय कांप,
रात की अंगडाई तारों से सजी
मेघों ने खोल दिया रात ढलते
सजल शामियाना आहिस्ते आहिस्ते,
खुली आँखों में मरू उद्यान  बसा
सपनों के क़ाफिले रुके ज़रूर
गीतों की बूंदें बरसीं
स्मृतियों ने बांधे नुपुर सुरीले
धड़कनों में था लेकिन सूनापन
आकाश ने उड़ेला पूरा आलोक
हमने चाहा बहुत मुस्कुराएँ
हँसी ओंठों तक पहुँचीं सहमे सहमे
सुबह से पहले बिखर गयीं सब
ओष की बूंदें बन कर .
--- शांतनु सान्याल




  

Thursday, 20 January 2011

अदृश्य त्वम् रूप


अदृश्य त्वम् रूप 
पृथ्वी व् आकाश मध्य है, अन्तर्निहित 
अविरल प्रवाहित त्वम् रूप माधुर्य अनंत,
अदृश्य करुणासागर सम कभी वृष्टि रुपी 
तुम जाते हो बरस, कभी शिशुमय क्रंदन, 
धूसर मेघों को दे जाते हो पल में मधु स्पर्श,
तृषित धरा के वक्ष स्थल पर हो तुम ओष
बिंदु, हे अनुपम !अश्रु जल में भी समाहित,
त्वम् दिव्य आलोक निमज्जित सर्व जीवन,
झंझा के विध्वंस अवशेषों में भी तुम हो एक 
आशा की किरण, ज्यों प्लावित भूमिखंड 
में उभर आयें आग्नेय शैल बारम्बार,
इस गहन अंधकार में हो तुम दिग्दर्शक 
कभी खंडित भू प्रस्तर से सहसा हो प्रगट,
कर जाते हो अचंभित, भर जाते हो प्रणय सुधा,
--- शांतनु सान्याल 
painting by - Jone Binzonelli

Wednesday, 19 January 2011

जीवन किसी तरह भी जी न सके

जीवन किसी तरह भी जी न सके

जीवन किसी तरह भी जी न सके 
बिहान से पहले बिखर गए निशि पुष्प 
अर्धअंकुरित बीजों में थी नमी दो पल, 
अंजनमय मेघ, शपथ  भूल गए,
टूटती सांसों का इतिहास कहीं भी नहीं,
सजल नेहों ने पतझड़ को द्वार 
खटखटाते पाया, जीवन व्यथा अपने 
आप ही भर जाये इस उम्मीद से,
उड़ते पत्तों का मनुहार मन में लिए, 
मरुस्थल  में असंख्य प्रसून  सजाया -
फिर से आँगन में डाली प्रणय रंगोली 
दर्पण की धूल हटाई निमग्न हो कर 
खुद को संवारा हमने, रक्तिम साँझ को 
आना है, आये, यमन रुपी ज़िन्दगी को, 
दुख हो या सुख हमने तो हर पल गाया,
ये और बात है कि तुम स्वरलिपि बन न 
सके, हम जीवन किसी तरह जी न सके !
--- शांतनु सान्याल

Friday, 7 January 2011

स्मृति मेघ

वो श्यामपट अब भी है मौजूद
वही खपरैलों वाली प्राथमिक पाठशाला
जहाँ हमने लिखी थीं बारहखड़ी
उस अरण्य गाँव में हमने सीखी थीं
हिंदी वर्ण माला, पढ़ी थीं -
रसखान और कबीर, हमें याद है
अब तक निराला की - वर दे वीणावादिनी,
 नंगे पांव हमने की थीं प्रभात फेरी,
 उस आम्र कुञ्ज के नीचे न तुम थे
हिंदी न हम थे मराठी या बंगाली
माघ की सिहरन में बिछाए टाट पट्टी
हमने दोहराए संस्कृत सुभाषितानि,
तुम्हें याद हो की न हो,हमने देखी थी
एक सी दुनिया, खेले थे -
नदी पहाड़, लुकछुप, संग गाए
 प्रचलित लोकगीत - इतना इतना पानी -
वो सीमाविहीन मधुरिम एक जगत,
वसंत पंचमी में न तुम थे हिन्दू
न हम ही मुसलमान, एक साथ गुथा
फूलों का हार,गाए थे सरस्वती वंदना
उस गाँव भी आज भी उडती है
धान की ख़ुश्बू हवाओं में,
सरसराते हैं गन्ने के फूल, गोधूली में
अक्सर उड़ते हैं रंगीन स्मृति मेघ
कहीं न कहीं वहीँ आसपास हमारी साँसें
आज भी तकती हैं उस नन्हीं सी नदी को
किसी नई आश लिए -
--- शांतनु सान्याल 

Tuesday, 4 January 2011

झूठ मूठ ही सही

झूठ मूठ ही सही चलों खेलें, फिर इक बार 
वो कच्ची उम्र की नादानियाँ, 
कुछ छोटे छोटे प्लास्टिक के बर्तन, 
ले आओ मिटटी के दीये बरामदे में 
कहीं हैं पड़े, पिछले दिवाली के 
चलो चलें जीने के नीचे या 
पलंग के किसी एक कोने में 
नन्हीं आँखों की दुनिया बसायें दोबारा 
तुम फिर पुकारो मुझे उसी 
मीठी मासूम मुस्कान लिए 
पप्पू के पापा, मैं कहूँ तुमें पप्पू की 
मम्मी, एक रिश्ता जो कभी हो 
न सका, सोचो ज़रा उसी अंदाज़ में 
कि हम लौट जाएँ उसी सुन्दर 
बचपन की वादियों में 
इस मायावी पृथ्वी से कहीं अधिक 
खूबसूरती है उस जहाँ में, 
कल्पना करो कि हम फिर से छूएं
इक दूजे को पवित्र भावनाओं से,
उसी निश्छल हँसी में तलाशें फिर 
खोई हुई ख़ुशियाँ, चलो फिर एक बार 
घर घर खेलें ---
--- शांतनु सान्याल