Friday, 11 November 2011


सूरजमुखी 

उस दर्द पोशीदा चेहरे में, ज़माने के इनाम थे 
उजागर, मुस्कराहटों में बूंद बूंद उसके 
खूं टपकते देखा, वो फिर भी 
जीने का अहद लेके 
मुस्कुराता रहा 
उम्रभर,

नुमाइशगाह में अक्सर ज़िन्दगी को दहकते 
देखा, लोग कहते रहे क्या ख़ूबसूरत
है मुस्सवरी, उस शाम के 
आस्मां में थे रंग यूँ 
तो  गहरे लेकिन 
स्याह रात 
में सभी 

नक़ली कपड़े उतरते देखा, उनकी हर बात में 
थी तिजारती बातें, लेन देन के सिवा 
कुछ भी नहीं, हर क़दम इक 
मरासिम, नए दस्तखत,
नए मुतालबे,
ज़िन्दगी

को हमने, हर मोड़ पे बिखरते देखा, सुबह थे 
सभी गुल ओ शाख़ अपनी जगह, 
शाम ढलते, सूरजमुखी को 
हमने न चाहते भी 
झुकते देखा.

- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
painting by :sunflower - Martha Kisling

سورجمكھي

اس درد پوشیدہ چہرے میں، زمانے کے انعام تھے
اجاگر، مسكراهٹو میں بوند بوند اس کے
كھو ٹپكتے دیکھا، وہ پھر بھی
جینے کا عہد لیکے
مسکراتا رہا
امربھر،

نماشگاه میں اکثر زندگی کو دہکتے
دیکھا، لوگ کہتے رہے کیا خوبصورت
ہے مسسوري، اس شام کے
اسما میں تھے رنگ یوں
تو گہرے لیکن
سیاہ رات
میں تمام

نقلی کپڑے اترتے دیکھا، ان کی ہر بات میں
تھی تجارتي باتیں، لین دین کے سوا
کچھ بھی نہیں، ہر قدم اک
مراسم، نئے دستخط،
نئے متالبے،
زندگی

کو ہم نے، ہر موڑ پہ بكھرتے دیکھا، صبح تھے
تمام گل او شاخ اپنی جگہ،
شام ڈھلتے، سورجمكھي کو
ہم نے نہ چاہتے بھی
جھکتے دیکھا.



-- شانتنو سانیال