Wednesday, 9 November 2011


मेरा वहम 

दिल फ़रेब ही सही कोई तो है चाहने वाला 
हमनफ़स न सही, बावाकिफ़ तो है 
वो बुझते हुए अंगारों से, 
उसकी सांसों की 
आंच ले घिर 
चले हैं 

फिर वादियों में सुरमई बादलों के महराब -
सूखे जरियान में उठ चलें  हैं 
चाहतों के लहर, खिल 
चले हैं वहशी गुल,
ज़िन्दगी फिर 
हमआहंग

है भूली बिसरी गीतों को गाने के लिए, न तोड़ 
यूँ मेरा वहम कि उठा हूँ मैं अभी अभी 
सजदे के बाद, उसके दिल में देखा 
है मैंने बुझते चिराग़ों की
रौशनी, सुफ़ियाना -
कायनात,

-- शांतनु सान्याल
  http://sanyalsduniya2.blogspot.com/ 

میرا وهم
دل فریب ہی سہی کوئی تو ہے چاہنے والا
همنفس نہ سہی، باواكف تو ہے
وہ بجھتے ہوئے انگاروں سے،
اس کی سانسوں کی
آنچ لے گھر
چلے ہیں

پھر مدعیان میں سرمي بادلوں کے مهراب --
سوکھے جريان میں اٹھ چلیں ہیں
چاهتو کے لہر، کھل
چلے ہیں وحشی گل،
زندگی پھر
هماهگ

ہے بھولی بسري گیتوں کو گانے کے لئے، نہ توڑ
یوں میرا وہم کہ اٹھا ہوں میں ابھی ابھی
سجدے کے بعد، اس کے دل میں دیکھا
ہے میں نے بجھتے چراغو کی
روشنی، سفيانا --
کائنات،
شانتنو سانیال