Monday, 3 October 2011

देखा है तुझे ज़िन्दगी 


पुरनम पलकों से गिरतीं उन बूंदों में कहीं यूँ 
बिखरतासा
देखा है तुझे  ज़िन्दगी 

बड़ा अपना सा लगे है वो पराया हो कर भी 
उन गहरी सांसों में डूबता उभरतासा, कई बार 
देखा है तुझे  ज़िन्दगी

मेरा अपना कुछ भी न था जो मैं दावा करूँ 
नाज़ुक सीड़ियों से गिरता उतरतासा, कई बार 
देखा है तुझे ज़िन्दगी 

अनजाना फ़र्श है ये शफाफ़ शीशे की मानिंद 
उलझन में अक्सर जहाँ फिसलतासा, कई बार 
देखा है तुझे ज़िन्दगी

न जाने वो कौन थे जो खूं रिसते  पांव हैं गुज़रे
इक रहगुज़र रात दिन यूँ सुलगतासा, कई बार 
देखा है तुझे ज़िन्दगी

उनकी अपनी तरजीह की थी शायद फेहरिस्त
हमदर्दी के लिए बेवजह मचलतासा, कई बार 
देखा है तुझे ज़िन्दगी

कोई ताजीर था जो बेच गया जज़्बाती रस्सियाँ
रेशमी फंदों में कहीं दम घुटतासा, कई बार 
देखा है तुझे ज़िन्दगी  -

-- शांतनु सान्याल
http://sanyalsduniya2.blogspot.com/
photo - Nadia Moro