Friday, 23 September 2011


ग़ज़ल 

रहने दे भरम क़ायम कुछ देर ही सही 
उनको है शायद मुझसे अपनापन ज़रा ज़रा 

फिर चाहती है ज़िन्दगी उजरत क्यूँ कर 
क़िस्तों में उठी है फिर ये धड़कन  ज़रा ज़रा 

उड़ती हैं तितलियाँ बचा काँटों से पंख अपने 
फिर खौफज़दा सा  है, लड़कपन ज़रा ज़रा 

वक़्त ने छीन लिया रंगों नूर कोई बात नहीं 
जानता है मुझे क़दीम वो दरपन ज़रा ज़रा
  
लिखे थे कभी उसने ज़िन्दगी पे क़िस्से हज़ार 
है आसना मुझसे उजड़ा अंजुमन ज़रा ज़रा  

बरगद के साए पे कमजकम न रख बाज़बिनी 
धूप ओ छांव का है अपना चलन ज़रा ज़रा

न मिटा पायी अह्सासे इंसानियत, तूफां भी  !
उठते  हैं दिलों में दर्द यूँ  आदतन ज़रा ज़रा 

-- शांतनु सान्याल 

उजरत - शुल्क 
आसना - पहचाना 
बाज़बिनी - सिकंजा 
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